शिमला की पहाड़ियों में दबा 66 करोड़ साल का राज, खड़ापत्थर का वह पेड़ जो डायनासोर के जमाने का है गवाह
शिमला से करीब 70 किलोमीटर दूर एक छोटा सा गांव है खड़ापत्थर। गांव का नाम सुनने में ही कुछ अटपटा लगता है, लेकिन यहाँ की पहाड़ियों में एक ऐसा राज दबा है जो वैज्ञानिकों को भी हैरान कर देता है। यहां मौजूद है एक विशाल वृक्ष जीवाश्म, जो उस जमाने का है जब धरती पर डायनासोर राज किया करते थे।
खड़ापत्थर में मिला यह जीवाश्म एक पेड़ का है, जो वैज्ञानिकों के अनुसार मेसोज़ोइक युग का है। यानी यह जीवाश्म 66 करोड़ साल से भी ज्यादा पुराना है। उस समय धरती का नक्शा आज से बिल्कुल अलग था। हिमालय अस्तित्व में नहीं था और वैज्ञानिकों के अनुसार यह इलाका किसी विशाल महासागर का हिस्सा रहा होगा।
साधारण पत्थर नहीं, एक पेट्रीफाइड वुड
उस जमाने को ‘रेप्टाइल्स का युग’ भी कहा जाता है। तब धरती पर डायनासोर और विशाल सरीसृप राज किया करते थे। यह पेड़ उन्हीं डायनासोरों के जमाने का साक्षी है, जो आज पत्थर में तब्दील होकर हमें उस प्राचीन दुनिया की कहानी सुना रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह कोई साधारण पत्थर नहीं है। यह एक पेट्रीफाइड वुड है।
लाखों साल पहले जब यह पेड़ प्राकृतिक आपदा में दब गया, तो पानी में मौजूद खनिज धीरे-धीरे पेड़ की लकड़ी की कोशिकाओं में घुसते गए और उनकी जगह ले ली। इस प्रक्रिया को पेट्रीफिकेशन कहते हैं। लकड़ी ने पत्थर का रूप ले लिया, लेकिन उसका आकार, उसकी बनावट और यहाँ तक कि उसके छल्ले आज भी साफ देखे जा सकते हैं।
करोड़ों साल पुराने इतिहास का दस्तावेज
गाँव का नाम ‘खड़ापत्थर’ रखे जाने की वजह शायद यही जीवाश्म है। स्थानीय लोग सदियों से इन पत्थरों को देखते आ रहे थे, लेकिन उन्हें नहीं पता था कि यह कोई साधारण चट्टान नहीं, बल्कि करोड़ों साल पुराने इतिहास का दस्तावेज है। यहाँ कई जीवाश्म पहाड़ियों में बिखरे पड़े हैं, लेकिन जागरूकता के अभाव में लोग उन्हें पत्थर ही समझते हैं।
भूवैज्ञानिकों के लिए यह जगह किसी खजाने से कम नहीं है। यह जीवाश्म इस बात का सबूत है कि कभी यह इलाका घने जंगलों से ढका रहा होगा और यहाँ की जलवायु आज से बिल्कुल अलग रही होगी। हिमालय के निर्माण से पहले यहाँ किस तरह के पेड़-पौधे और जीव-जंतु थे, इसका अंदाजा लगाने में यह जीवाश्म मददगार साबित हो सकता है।
भूविज्ञान के स्टूडेंट्स के लिए खुली किताब
जब यह पेड़ हरा-भरा था, तब हिमालय का अस्तित्व नहीं था। यह पेड़ उस जमाने का है जब भारतीय प्लेट एशिया से टकराकर हिमालय को जन्म देने वाली थी। अगर सही तरीके से संरक्षित किया जाए और वैज्ञानिक अध्ययन कराए जाएँ, तो यह जीवाश्म पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र और भूविज्ञान के छात्रों के लिए एक खुली किताब की तरह काम कर सकता है।
मेसोज़ोइक युग तीन हिस्सों में बंटा था। ट्राइऐसिक, जुरासिक और क्रिटेशियस। डायनासोर का उदय और अंत दोनों इसी युग में हुआ। पेट्रीफाइड वुड को पहचानना आसान है। अगर किसी पत्थर पर लकड़ी के दाने या छाल की बनावट दिखे, तो समझ जाइए कि वह कोई साधारण पत्थर नहीं है, बल्कि वह एक जीवाश्म हो सकता है।










