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पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व केंद्रीय मंत्री शांता कुमार ने देश की वर्तमान सामाजिक और आर्थिक स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त की है। यूजीसी के एक नए नियम पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा लगाई गई रोक का स्वागत करते हुए उन्होंने कहा कि न्यायालय की यह टिप्पणी अत्यंत महत्वपूर्ण है कि भारत एक जाति विहीन समाज की रचना की ओर अग्रसर है, जबकि ऐसे नियम देश को पीछे धकेलने वाले हैं।
जातिवाद बना गुलामी का कारण
शांता कुमार ने भारतीय इतिहास के आत्मनिरीक्षण पर जोर देते हुए कहा कि यह एक विडंबना है कि जिस समाज ने वेदों और उपनिषदों की रचना कर विश्व को सर्वोच्च आध्यात्मिक ज्ञान दिया, वही समाज सदियों तक विदेशियों का गुलाम रहा। उन्होंने दोटूक शब्दों में कहा कि इतिहास की कड़वी सच्चाई यह है कि हमारा समाज जातियों में बंटा। हमने अपनों को ही अछूत कहकर दुत्कारा, जिसे बाद में विदेशियों ने गले लगाया। केवल जातिवाद और कुछ नेताओं के अहंकार के कारण भारत टूटा और हमें पराधीनता झेलनी पड़ी।
आरक्षण और जातिवाद पर किया प्रहार
शांता कुमार ने कहा कि आजादी के बाद जाति के आधार पर दिए गए आरक्षण ने जातिवाद की जड़ों को और मजबूत कर दिया है। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के सुझावों का समर्थन करते हुए कहा कि अदालत तीन बार आरक्षित जातियों में से क्रीमी लेयर (संपन्न वर्ग) को बाहर करने की बात कह चुकी है। शांता कुमार के अनुसार आरक्षण का वास्तविक लाभ आज भी केवल प्रभावशाली लोग उठा रहे हैं, जबकि पात्र व्यक्ति वंचित हैं।
कुछ बच्चे आलीशान कारों में घूमते हैं और कुछ नंगे पैर चलने को मजबूर
देश की आर्थिक स्थिति पर प्रहार करते हुए शांता कुमार ने कहा कि भारत आज दुनिया के पांच सबसे अमीर देशों में शुमार है, लेकिन यह भी एक कड़वा सच है कि दुनिया के सबसे ज्यादा गरीब और भूखे लोग यहीं रहते हैं। उन्होंने कहा कि भारत की समस्या गरीबी नहीं, बल्कि भयानक आर्थिक विषमता है। देश उस परिवार की तरह बन गया है जहां कुछ बच्चे आलीशान कारों में घूमते हैं और कुछ नंगे पैर चलने को मजबूर हैं। विकास तो हो रहा है, लेकिन अमीर और गरीब के बीच की खाई भी उतनी ही तेजी से बढ़ रही है।
आर्थिक विषमता को दूर करना ही सबसे बड़ी प्राथमिकता
शांता कुमार ने याद दिलाया कि हिमाचल प्रदेश और राजस्थान में अंत्योदय योजना के माध्यम से इस विषमता को कम करने का प्रयास किया गया था। उन्होंने केंद्र और राज्य सरकारों से आह्वान किया कि आज भारत की सबसे बड़ी प्राथमिकता प्रतिदिन बढ़ती इस आर्थिक विषमता को दूर करना होनी चाहिए।











