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चिटटे_का_कहर_युवाओं_में_लत_समस्या_और_समाधान

Khabron wala

चिट्टा (हेरोइन) हमारे सेंट्रल नर्वस सिस्टम के लिए उत्तेजक की तरह काम करते हैं। यानी हमारे दिमाग और रीढ़ की हड्डी के बीच के उस महत्वपूर्ण हिस्से की गतिविधियों को बढ़ा देता है, जिसका काम शरीर के विभिन्न हिस्सों से सिग्नल लेना है और कोई हरकत करने के लिए संदेश भेजना है। इस ड्रग्स को कई तरह से लिया जाता है। सीधे मुंह से निगलकर, नाक से सूंघकर, धुएं के जरिए, नस में इंजेक्शन लगाकर, मांसपेशियों में इंजेक्शन लगाकर या फिर त्वचा के बाहरी हिस्से में इंजेक्शन लगाकर। इसके अलावा गूदा या योनि में रखकर भी इसे इस्तेमाल किया जाता है।

क्या है हेरोइन ?

चिट्टा, जिसे हेरोइन या डायमॉर्फिन भी कहते हैं, एक अत्यधिक नशे वाला ओपिओइड है जो अफीम पोस्त से प्राप्त होता है। यह सफेद या भूरे रंग का पाउडर होता है जिसे आमतौर पर सूंघा जाता है, धूम्रपान किया जाता है, या इंजेक्शन के रूप में लिया जाता है। इसके सेवन से तुरंत एक तीव्र “हाई” महसूस होता है – एक आनंद और शांति की लहर। लेकिन यही क्षणिक सुख इसके घातक जाल का पहला कदम होता है।

यह इतना तेज़ी से क्यों फैल रहा है? इसके कई जटिल कारण हैं:

* आसानी से उपलब्धता: आज यह पहले से कहीं ज़्यादा आसानी से उपलब्ध है। तस्करों ने अपने नेटवर्क को ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में फैला दिया है। “डोर-स्टेप डिलीवरी” की तरह यह युवाओं तक पहुँच रहा है।

* कम कीमत का भ्रम: शुरुआत में इसकी कीमत कम बताई जाती है, जिससे युवा इसे आज़माने के लिए आकर्षित होते हैं। उन्हें नहीं पता होता कि यह “सस्ता” नशा उनकी पूरी ज़िंदगी की कीमत वसूल लेगा।

* बेरोज़गारी और निराशा: युवाओं में बढ़ती बेरोज़गारी और भविष्य को लेकर अनिश्चितता उन्हें नशे की ओर धकेल रही है। निराशा और तनाव से मुक्ति पाने के लिए वे इसे एक आसान रास्ता मान लेते हैं।

* साथियों का दबाव : कई बार दोस्त या साथी समूह का दबाव युवाओं को नशा करने के लिए मजबूर करता है। “कूल” दिखने या समूह का हिस्सा बनने की चाह में वे इस दलदल में फंस जाते हैं।

* सामाजिक और पारिवारिक विघटन: टूटे हुए परिवार, माता-पिता का ध्यान न होना, या पारिवारिक कलह भी युवाओं को नशे की ओर धकेल सकता है। जब घर में सुरक्षा और स्नेह नहीं मिलता, तो वे बाहर सहारा ढूंढते हैं।

* नकली चमक और गलत जानकारी: सोशल मीडिया और कुछ फिल्मों में नशे को महिमामंडित करने से भी युवाओं के मन में गलत धारणा बनती है। उन्हें लगता है कि यह कोई “एडवेंचर” है।

* सीमा पार से तस्करी: पड़ोसी देशों से नशीले पदार्थों की तस्करी एक बड़ी समस्या है, जिससे हमारे देश में इसकी उपलब्धता बढ़ रही है।

चिट्टा के विनाशकारी परिणाम:

इसके परिणाम सिर्फ व्यक्ति तक सीमित नहीं रहते, बल्कि पूरे समाज को प्रभावित करते हैं:

* स्वास्थ्य का विनाश: यह सीधे केंद्रीय तंत्रिका तंत्र पर हमला करता है। फेफड़े, गुर्दे, हृदय और लीवर बुरी तरह प्रभावित होते हैं। इंजेक्शन से HIV/AIDS और हेपेटाइटिस जैसी बीमारियाँ फैलती हैं। मानसिक स्वास्थ्य भी बिगड़ता है, डिप्रेशन, एंग्जायटी और पैरानोइया आम हो जाते हैं।

* आर्थिक बर्बादी: नशा खरीदने के लिए युवा अपना सब कुछ बेच देते हैं – घर के गहने, ज़मीन, यहाँ तक कि अपनी गाड़ियाँ भी। परिवार दिवालिया हो जाते हैं।

* अपराध में वृद्धि: नशे की लत को पूरा करने के लिए युवा चोरी, लूटपाट और अन्य आपराधिक गतिविधियों में संलिप्त हो जाते हैं। इससे समाज में असुरक्षा बढ़ती है।

* सामाजिक पतन: नशेड़ी व्यक्ति समाज से कट जाता है। परिवार टूट जाते हैं, रिश्ते बिखर जाते हैं। यह एक पूरी पीढ़ी को निष्क्रिय और अक्षम बना देता है।

* मृत्यु: सबसे दुखद परिणाम है युवा जानें गंवाना। ओवरडोज़, बीमारियों या दुर्घटनाओं के कारण हज़ारों युवा हर साल अपनी जान गँवा रहे हैं।

समाधान के सुझाव: यह एक बहुआयामी समस्या है, और इसका समाधान भी बहुआयामी ही होगा। हमें सरकार, समाज, परिवार और व्यक्ति – सभी स्तरों पर मिलकर काम करना होगा।

1. रोकथाम : सबसे महत्वपूर्ण कदम

* जागरूकता अभियान: स्कूलों, कॉलेजों और ग्रामीण क्षेत्रों में व्यापक जागरूकता अभियान चलाए जाएँ। सिर्फ “नशा बुरा है” कहने के बजाय, इसके दुष्प्रभावों को ग्राफिक रूप से दिखाया जाए और नशे के पीछे के मनोवैज्ञानिक कारणों पर भी बात की जाए। नुक्कड़ नाटक, शॉर्ट फिल्में, और सोशल मीडिया का प्रभावी इस्तेमाल हो।

* जीवन कौशल शिक्षा: युवाओं को तनाव प्रबंधन, निर्णय लेने की क्षमता, साथियों के दबाव से निपटने और समस्या-समाधान जैसे जीवन कौशल सिखाए जाएँ।

* बेहतर शिक्षा और रोज़गार के अवसर: युवाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और पर्याप्त रोज़गार के अवसर प्रदान किए जाएँ ताकि वे सकारात्मक गतिविधियों में व्यस्त रहें और निराशा से बचें। कौशल विकास कार्यक्रमों को बढ़ावा मिले।

* सकारात्मक विकल्प: खेल, कला, संगीत, सामाजिक कार्य और सामुदायिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाए ताकि युवाओं को नशे से दूर रहने के लिए सकारात्मक विकल्प मिलें। खेल के मैदान और सामुदायिक केंद्र विकसित हों।

* पारिवारिक भूमिका: माता-पिता अपने बच्चों के साथ मजबूत संबंध बनाएँ। उनसे खुलकर बात करें, उनकी समस्याओं को समझें और उन्हें भावनात्मक सहारा दें। बच्चों पर नज़र रखें, लेकिन उन पर बेवजह शक न करें।

2. आपूर्ति पर शिकंजा :

* कठोर कानून और प्रवर्तन: नशा तस्करों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई की जाए। उनके नेटवर्क को तोड़ना और उनकी संपत्ति जब्त करना प्राथमिकता होनी चाहिए।

* सीमा सुरक्षा को मजबूत करना: सीमावर्ती क्षेत्रों में तस्करी रोकने के लिए सुरक्षा बलों को अत्याधुनिक उपकरण और प्रशिक्षण प्रदान किया जाए।

* खुफिया जानकारी का बेहतर उपयोग: पुलिस और अन्य एजेंसियों को खुफिया जानकारी इकट्ठा करने और साझा करने के लिए बेहतर समन्वय स्थापित करना चाहिए।

* सामुदायिक पुलिसिंग: स्थानीय समुदायों को नशा तस्करों के बारे में जानकारी देने के लिए प्रोत्साहित किया जाए और उन्हें सुरक्षा का आश्वासन दिया जाए।

3. उपचार और पुनर्वास

* सुलभ डी-एडिक्शन सेंटर: सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रों में पर्याप्त संख्या में गुणवत्तापूर्ण नशामुक्ति केंद्र स्थापित किए जाएँ। ये केंद्र केवल डिटॉक्सिफिकेशन तक सीमित न रहें, बल्कि मनोवैज्ञानिक परामर्श और दीर्घकालिक सहायता भी प्रदान करें।

* मानसिक स्वास्थ्य सहायता: नशे की लत अक्सर अवसाद, चिंता या अन्य मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से जुड़ी होती है। इसलिए, नशामुक्ति के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य सहायता भी अनिवार्य होनी चाहिए।

* पुनर्वास और सामाजिक एकीकरण: नशामुक्ति के बाद व्यक्ति को समाज में फिर से स्थापित करने में मदद करना महत्वपूर्ण है। उन्हें व्यावसायिक प्रशिक्षण, रोज़गार के अवसर और सामाजिक समर्थन प्रदान किया जाए ताकि वे दोबारा नशे की ओर न मुड़ें।

* पारिवारिक परामर्श: परिवार के सदस्यों को भी परामर्श और सहायता प्रदान की जाए, क्योंकि वे अक्सर नशेड़ी व्यक्ति की लत से सबसे ज़्यादा प्रभावित होते हैं।

4. सरकारी नीतियाँ और सामाजिक पहल:

* राष्ट्रीय नशा विरोधी नीति: केंद्र और राज्य सरकारों को एक मजबूत, एकीकृत और प्रभावी राष्ट्रीय नशा विरोधी नीति बनानी चाहिए जिसमें रोकथाम, उपचार, पुनर्वास और प्रवर्तन के सभी पहलू शामिल हों।

* अनुसंधान और डेटा संग्रह: नशे की समस्या के कारणों और प्रभावों पर गहन शोध किया जाए, और सटीक डेटा एकत्र किया जाए ताकि प्रभावी रणनीतियाँ बनाई जा सकें।

* समुदाय आधारित पहल: स्थानीय समुदायों, धार्मिक संगठनों और गैर-सरकारी संगठनों को नशे के खिलाफ लड़ाई में सक्रिय रूप से शामिल किया जाए।

* मीडिया की सकारात्मक भूमिका: मीडिया को नशे के महिमामंडन से बचना चाहिए और इसके बजाय जागरूकता फैलाने और सफल पुनर्वास कहानियों को उजागर करने में अपनी भूमिका निभानी चाहिए।

हिमाचल के परिपेक्ष में:

अब प्रदेश में किसी भी सरकारी पद पर नियुक्ति पाने के लिए अभ्यर्थियों को “ड्रग टेस्ट” की अग्निपरीक्षा से गुजरना होगा। नशे की जड़ पर प्रहार करने के लिए प्रदेश के सभी स्कूलों और कॉलेजों में “एंटी-ड्रग क्लब” और “प्रहरी क्लबों” को न केवल शुरू किया जा रहा है, बल्कि उन्हें और अधिक सक्रिय बनाया जा रहा है।

सिस्टम में पारदर्शिता और शुचिता बनाए रखने के लिए सरकार ने एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए सभी सरकारी भर्तियों में “ड्रग टेस्ट” अनिवार्य कर दिया है। यह सुनिश्चित करेगा कि प्रदेश की प्रशासनिक सेवाओं में आने वाले युवा नशा मुक्त हों। हिमाचल को नशा मुक्त बनाना केवल एक प्रशासनिक लक्ष्य नहीं, बल्कि एक सामाजिक जिम्मेदारी है।

हिमाचल प्रदेश सरकार ने नशे के खिलाफ कार्रवाई को और अधिक प्रभावी बनाने के उद्देश्य से बड़ा प्रशासनिक कदम उठाया है। प्रदेश सरकार ने एंटी नारकोटिक्स टास्क फोर्स और स्पेशल टास्क फोर्स का विलय कर “एकीकृत स्पेशल टास्क फोर्स” के गठन के आदेश जारी किए हैं। इस संबंध में गृह विभाग की ओर से अधिसूचना जारी कर दी गई है। अधिसूचना के अनुसार, राज्य कर एवं आबकारी विभाग के अधीन गठित एंटी नारकोटिक्स टास्क फोर्स को गृह विभाग के तहत गठित स्पेशल टास्क फोर्स में मिलाया गया है। अब यह संयुक्त इकाई गृह विभाग के प्रशासनिक नियंत्रण में कार्य करेगी। एकीकृत स्पेशल टास्क फोर्स प्रदेश में अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक के समग्र पर्यवेक्षण में कार्य करेगी। साथ ही यह इकाई राज्य नार्को समन्वय केंद्र के सचिवालय के रूप में भी काम करेगी, जिससे विभिन्न एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल सुनिश्चित किया जा सकेगा। “चिट्टे पर प्रहार, हिमाचल है तैयार”। हिमाचल प्रदेश में अनेक स्थानों पर जैसे धर्मशाला , हमीरपुर, बिलासपुर, ऊना में सफलतापूर्वक “एंटी चिट्टा वॉकथान” का आयोजन किया जा रहा है जिसमें हजारों स्कूली और कॉलेज के छात्र भाग ले रहे हैं। हिमाचल प्रदेश के सीएम सुखविंदर सिंह सुक्खू ने चिट्ठा खत्म करने के लिए इनाम की घोषणा की। उन्होंने कहा-जो व्यक्ति 2 ग्राम चिट्टा की सूचना देगा, उसे 10 हजार रुपए, 25 ग्राम की सूचना पर 50 हजार रुपए और बड़े नेटवर्क को पकड़वाने की सूचना देने वालों को 1 लाख रुपए इनाम दिया जाएगा। इनामी राशि का भुगतान एक महीने के भीतर होगा। लोग इसकी सूचना 112 नंबर पर दे सकेंगे। लोगों के नाम और पहचान गुप्त रखे जाएंगे।

निष्कर्ष: चिट्टे का कहर हमारे समाज के लिए एक गंभीर चेतावनी है। यह समय है कि हम जागें और इस चुनौती का मिलकर सामना करें। हमारे युवा हमारे देश का भविष्य हैं, और उन्हें इस दलदल से निकालना हमारी सामूहिक ज़िम्मेदारी है। हर परिवार, हर व्यक्ति को इस लड़ाई में अपना योगदान देना होगा। तभी हम एक स्वस्थ, नशामुक्त और सशक्त पीढ़ी का निर्माण कर पाएंगे। यह आसान नहीं होगा, लेकिन अगर हम दृढ़ संकल्प और एकजुटता से काम करें, तो इस अंधेरे को निश्चित रूप से दूर कर सकते हैं और अपने युवाओं को एक उज्ज्वल भविष्य दे सकते हैं।

@शशि पाल प्रवक्ता इतिहास रा वा मा पाठशाला जटहेड़ी ऊना हिमाचल प्रदेश

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