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चालदा महाराज—जो रुकते नहीं, चलते हैं ,दसऊ से पश्मी तक आस्था की पदयात्रा, नम आँखों से हुई विदाई

Khabron wala 

उत्तराखंड के दसऊ गाँव में आज आस्था, विरह और श्रद्धा का अनोखा संगम देखने को मिला। वर्षों से भक्तों के बीच विराजमान चालदा महासू महाराज अब हिमाचल प्रदेश के सिरमौर ज़िले के पश्मी गाँव के लिए प्रस्थान कर चुके हैं। यह मात्र एक प्रस्थान नहीं, बल्कि पहाड़ों की उस भावनात्मक सच्चाई की अभिव्यक्ति है, जिसे केवल एक पहाड़ी ही पूरी तरह महसूस कर सकता है।

चालदा महासू महाराज को भगवान शिव का अवतार माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार कार्तिकेय के दिव्य त्याग से चार महासू भ्राता उत्पन्न हुए—बासिक, पवासिक, बोठा और चालदा। इनमें चालदा महाराज को न्याय का देवता माना जाता है, जो सदैव प्रवास में रहते हैं। इसी कारण उन्हें छत्रधारी और चलने वाले देवता के नाम से भी जाना जाता है।

स्थानीय जनश्रुतियों के अनुसार जब “घांडुवा” नामक देव-चिह्न स्वरूप बकरा किसी भूमि पर पहुँचता है, तो कुछ वर्षों के भीतर वहाँ चालदा महाराज का भी आगमन सुनिश्चित होता है। लगभग पाँच वर्ष पूर्व यह घांडुवा सिरमौर के पश्मी गाँव पहुँचा था, और अब 14 दिसंबर को चालदा महाराज के वहाँ विधिवत विराजमान होने की मान्यता है।

यह कथा केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि वह अदृश्य शक्ति है जो आज भी उत्तराखंड और हिमाचल के पहाड़ी समाज को एक सूत्र में बाँधे हुए है।

माने तो सब कुछ—ना माने तो कुछ भी नहीं।

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