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जब मौत सामने खड़ी हो, तो इंसान अक्सर अपनी जान बचाने के लिए भागता है। लेकिन शिमला के चौपाल निवासी 25 वर्षीय रीतिक चौहान ने इसके उलट मिसाल पेश की। अपनी परवाह किए बिना मौत के आगे कूदकर दो नन्ही जानों को नया जीवन देने वाले इस जांबाज को अब राज्यस्तरीय गणतंत्र दिवस समारोह में विशेष सम्मान मिलने जा रहा है।
वह मंजर जिसने बदल दी रीतिक की दुनिया
यह वाकया 8 अप्रैल 2024 का है, जब सोलन के पास कालका-शिमला रेलवे ट्रैक पर बिलासपुर की दो छोटी बच्चियां खेल रही थीं। सामने से काल बनकर ट्रेन आ रही थी और बच्चियां डर के मारे सुध-बुध खोकर पटरी पर ही जम गईं। रीतिक ने फुर्ती दिखाई और अपनी जान की बाजी लगाकर दोनों बच्चियों को ट्रैक से बाहर धकेल दिया।
बच्चियां तो सुरक्षित बच गईं, लेकिन इस संघर्ष में रीतिक का एक पैर ट्रेन के पहियों के नीचे आ गया। पीजीआई चंडीगढ़ में इलाज के दौरान डॉक्टरों को घुटने के नीचे से उनकी टांग काटनी पड़ी। आज वह एक कृत्रिम पैर के सहारे चलते हैं, लेकिन उनके हौसले अब भी हिमालय जितने ऊंचे हैं।
राज्यपाल और मुख्यमंत्री करेंगे सम्मानित
रीतिक की इस निस्वार्थ वीरता के लिए सरकार उन्हें गणतंत्र दिवस पर जीवनरक्षक पदक से नवाजने जा रही है। शिमला में आयोजित होने वाले मुख्य समारोह में हिमाचल के राज्यपाल शिव प्रताप शुक्ल और मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू संयुक्त रूप से उन्हें सम्मानित करेंगे। गौरतलब है कि इस वर्ष राज्य स्तर पर इस सम्मान के लिए चुने जाने वाले रीतिक इकलौते साहसी व्यक्ति हैं।
संघर्ष की नई कहानी: बर्फबारी और बेरोजगारी
वीरता के इस सम्मान के बीच रीतिक के जीवन में चुनौतियां कम नहीं हैं। उनके गांव गागना (ननाहर पंचायत) में भारी बर्फबारी हुई है, जिसके कारण रास्ते और बिजली सेवा ठप है। ऐसे में उनका शिमला पहुंच पाना मौसम पर निर्भर करता है।
“मेरा गांव ढाई-तीन फीट बर्फ की चादर में लिपटा है। मुझे सरकार का न्योता तो मिला है, लेकिन सड़कें बंद होने की वजह से पहुंचना मुश्किल लग रहा है।” — रीतिक चौहान
कभी सोलन की एक प्राइवेट कंपनी में काम करने वाले रीतिक अब बेरोजगार हैं। हादसे के बाद उनकी शारीरिक स्थिति बदल गई, जिससे उनकी नौकरी छूट गई, फिर भी उन्हें इस बात का कोई मलाल नहीं कि उन्होंने दूसरों के लिए अपनी टांग गंवा दी।











