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हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने जमीन और काश्तकारी विवाद से जुड़े 49 साल पुराने मामले में स्पष्ट किया है कि किसी भी संपत्ति की केवल लंबे समय तक देखरेख करने वाला केयरटेकर या नौकर, उस संपत्ति पर मालिकाना हक या काश्तकारी अधिकार का दावा नहीं कर सकता। न्यायाधीश रोमेश वर्मा ने करीब 49 वर्ष से चल रहे इस कानूनी विवाद को समाप्त करते हुए प्रतिवादी की अपील को खारिज कर दिया।
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में पाया कि साल 1976 में पटवारी द्वारा खसरा गिरदावरी में प्रतिवादी का नाम बतौर किरायेदार दर्ज करते समय हिमाचल प्रदेश लैंड रिकार्ड्स मैन्युअल के नियम 9.8 और 8.15 का उल्लंघन किया गया था। नियमानुसार किसी भी जीवित किरायेदारी को दर्ज करने से पहले तहसीलदार द्वारा दोनों पक्षों को सुनवाई का उचित मौका देना अनिवार्य है।
इस मामले में मालिक की अनुपस्थिति का फायदा उठाकर बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के राजस्व रिकार्ड बदला था, जिसकी कानून की नजर में कोई अहमियत नहीं है। अदालत ने कहा कि वादी साल 1977 से न्याय के लिए भटक रहा है और करीब 49 साल बीतने के बाद भी उसे अपनी ही संपत्ति का सुख नहीं मिल सका। हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और जिला अदालत धर्मशाला के पुराने फैसलों को सही ठहराते हुए आदेश दिया कि वादी को उसकी जमीन का वास्तविक कब्जा तुरंत दिलाया जाए।
यह कानूनी लड़ाई साल 1977 में कांगड़ा जिला के धर्मशाला की अदालत से शुरू हुई थी। वादी ने प्रतिवादी के खिलाफ जमीन की बहाली और कब्जे के लिए मुकदमा दायर किया था। वादी का कहना था कि उनके पिता ने अनुपस्थिति में वादी को केवल जमीन और मकान की देखरेख के लिए रखा था। लेकिन प्रतिवादी ने राजस्व कर्मियों से मिलीभगत कर राजस्व रिकार्ड (खसरा गिरदावरी) में खुद को धोखे से किरायेदार दर्ज करवा लिया।









