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पर्यटन एवं आस्था का अनूठा संगम: श्री रेणुका जी मेला

Desk by Desk
9 years ago
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मां पुत्र के पावन मिलन का श्री रेणुकाजी मेला हिमाचल प्रदेश के प्राचीन मेलांे में से एक है, जो हर वर्ष कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की दशमी से पूर्णिमा तक उतरी भारत के प्रसिद्ध तीर्थस्थल श्रीरेणुका में मनाया जाता है। जनश्रुति के अनुसार इस दिन भगवान परशुराम जामूकोटी से वर्ष में एक बार अपनी मां रेणुका से मिलने आते है।
यह मेला श्रीरेणुका मां के वात्सल्य एवं पुत्र की श्रद्धा का एक अनूठा संगम है जोकि असंख्य लोगों  की अटूट श्रद्धा एवं आस्था का प्रतीक है। इस वर्ष यह मेला श्री रेणुकाजी तीर्थाटन पर 30 अक्तूबर  से 04  नवम्बर, 2017 तक परम्परागत एवं बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है।
मध्य हिमालय की पहाड़ियों के आंचल मंे सिरमौर के गिरिपार क्षेत्र का पहला पड़ाव है श्री रेणुका जी। यह स्थान नाहन से लगभग 40 किलोमीटर की दूरी पर उत्तर भारत का प्रसिद्ध धार्मिक एवं पर्यटन स्थल के रूप में जाना जाता है जहां नारी देह के आकार की प्राकृतिक झील जिसे मां रेणुका जी की प्रतिछाया भी माना जाता है, स्थित है। इसी झील के किनारे मां श्री रेणुका जी व भगवान् परशुराम जी के भव्य मन्दिर स्थित हैं।
कथानक अनुसार प्राचीन काल मे आर्यवर्त में हैहयवंशी श्रत्रीय राज करते थे तथा भृगुवंशी ब्राहमण उनके राज पुरोहित थे इसी भृगुवंश के महर्षि ऋचिक के घर महर्षि  जमदग्नि का जन्म हुआ। इनका विवाह इक्ष्वाकु कुल के ऋषि रेणु की कन्या रेणुका से हुआ। महर्षि जमदग्नि सपरिवार इसी क्षेत्र मे तपस्या मग्न रहने लगे। जिस स्थान पर उन्हांेने तपस्या की वह ‘तपे का टीला’ कहलाता है। वैशारव शुक्ल पक्ष की तृतीया को मां रेणुका के गर्भ से भगवान परशुराम ने जन्म लिया। इन्हें भगवान विष्णु का छठा अवतार माना जाता है।
अश्वत्थामा, ब्यास, बलि, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य व मारकण्डेय के साथ अष्ठ चिरंजीवियों के साथ भगवान परशुराम भी चिरंजीवी हैं। महर्षि जमदग्नि के पास कामधेनु गाय थी जिसे पाने के लिए सभी तत्कालीन राजा ऋषि लालायित थे। राजा अर्जुन ने वरदान में भगवान दतात्रेय से एक हजार भुजाएं पाई थी जिसके कारण वह सहस्त्रार्जुन कहलाए जाने लगा । एक दिन वह महर्षि जमदग्नि के पास कामधेनु मांगने पहुंच गया।
महर्षि जमदग्नि ने सहस्त्रबाहु एवं उसके सैनिकों का खूब सत्कार किया तथा उसे समझाया कि कामधेनु गाय उसके पास कुबेर जी की अमानत थी जिसे किसी को नहीं दिया जा सकता। यह सुनकर गुस्साए सहस्त्रबाहु ने महर्षि जमदग्नि की हत्या कर दी। यह सुनकर मां रेणुका शोकवश राम सरोवर मे कूद गई। राम सरोवर ने मां रेणुका की देह को ढ़कने का प्रयास किया जिससे इसका आकार स्त्री देह समान हो गया।
उधर भगवान परशुराम महेन्द्र पर्वत पर तपस्या मे लीन थे, लेकिन योगशक्ति से उन्हें अपनी जननी एवं जनक के साथ हुए घटनाक्रम का अहसास हुआ और उनकी तपस्या टूट गई। परशुराम अति क्रोधित होकर सहस्त्रबाहु को ढूंढने निकल पड़े तथा उसे आमने-सामने के युद्ध के लिए ललकारा। परम्वीर भगवान परशुराम ने सेना सहित सहस्त्रबाहु का वध कर दिया।  तत्पश्चात् भगवान परशुराम ने अपनी योगशक्ति से पिता जमदग्नि तथा मां रेणुका को जीवित कर दिया। माता रेणुका ने वचन दिया कि वह प्रति वर्ष इस दिन कार्तिक मास की देवोत्थान एकादशी को अपने पुत्र भगवान परशुराम को मिलने आया करेगी।
एक अन्य कथा के अनुसार, महर्षि जमदग्नि तपस्या मे लीन रहते थे। ऋषि पत्नी रेणुका पतिव्रता रहते हुए धर्म कर्म मे लीन रहती थी। वे प्रतिदिन गिरि गंगा का जल पीते थे तथा उससे ही स्नान करते थे। उनकी पतिव्रता पत्नी रेणुका कच्चे घड़े में नदी से पानी लाती थी। सतीत्व के कारण वह कच्चा घड़ा कभी नहीं गलता था। एक दिन जब वह पानी लेकर सरोवर से आ रही थी तो दूर एक गर्न्धव जोड़े को कामक्रीड़ा मे व्यस्त देखकर वह भी क्षण भर के लिए विचलित हो गई तथा आश्रम देरी से पहुंची। ऋषि जमदग्नि ने अन्तर्ज्ञान से जब विलम्ब का कारण जाना तो वह रेणुका के सतीत्व के प्रति आशंकित हो गए ओैर उन्होंने एक-एक करके अपने 100 पुत्रों को माता का वध करने का आदेश दिया परन्तु उनमें से केवल पुत्र परशुराम ने ही पिता की आज्ञा का पालन करते हुए माता का वध कर दिया।
         इस कृत्य से प्रसन्न होकर ऋषि जमदग्नि ने पुत्र से वर मांगने को कहा तो भगवान् परशुराम ने अपने पिता से माता को पुनर्जीवित करने का वरदान मांगा। माता रेणुका ने वचन दिया कि वह प्रति वर्ष इस दिन डेढ़ घड़ी के लिए अपने पुत्र भगवान् परशुराम से मिला करंेगी। तब से हर साल कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की दशमी को भगवान परशुराम अपनी माता रेणुका से मिलने आते हैं मॉं-बेटे के इस पावन मिलन के अवसर से रेणुका मेला आरम्भ होता है। तब की डेढ़ घड़ी आज के डेढ दिन के बराबर है तथा पहले यह मेला डेढ दिन का हुआ करता था जो वर्तमान में लोगों की श्रद्धा व जनसैेलाब को देखते हुए यह कार्तिक शुक्ल दशमी से पूर्णिमा तक आयोजित किया जाता है।
मेला श्री रेणुका मां के वात्सल्य एवं पुत्र की श्रद्धा का एक अनूठा आयोजन है। छः दिन तक चलने वाले इस मेले मंे आसपास के सभी ग्राम देवता अपनी-अपनी पालकी में सुसज्जित होकर मां-पुत्र के इस दिव्य मिलन में शामिल होते हैं। कई धार्मिक अनुष्ठान सांस्कृतिक कार्यक्रम, हवन्, यज्ञ, प्रवचन एवं हर्षोल्लास इस मेले का भाग है। हिमाचल प्रदेश, उतरांचल, पंजाब तथा हरियाणा के लोगों की इसमे अटूट श्रद्धा है।
राज्य सरकार द्वारा इस मेले को अन्तर्राष्ट्रीय मेला घोषित किया गया है। श्री रेणुका विकास बोर्ड द्वारा मेले की पारम्परिक गरिमा बनाए रखने के अतिरिक्त इसे और आकर्षक बनाने के लिए भरसक प्रयास किए जा रहे है तथा मेले में आने वाले श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए सभी आवश्यक प्रबन्ध किए गए है। परम्परा के अनुसार 30 अक्तूबर को ददाहू से भगवान परशुराम की शोभा यात्रा निकाली जाएगी, जिसमें क्षेत्र के अन्य देवी देवता भी भाग लेगें। 31 अक्तूबर को प्रबोधनी एकादशी और 04 नवम्बर को पूर्णमासी के पावन अवसर पर प्रातः रेणुका झील में स्नान करने का विशेष पर्व होगा, इस दौरान असंख्य श्रद्धालु रेणुका झील के पवित्र जल में स्नान करके पुण्य प्राप्त करेंगें।
लेखक बी0आर0चौहान  जिला लोक सम्पर्क अधिकारी सिरमौर
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