देवभूमि हिमाचल की आस्था और पर्यटन पर बढ़ता कचरे का संकट
हिमाचल प्रदेश को सदियों से “देवभूमि” के नाम से जाना जाता है। यहां के बर्फ से ढके पर्वत, निर्मल नदियां, घने देवदार वन और प्राचीन मंदिर न केवल श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक शांति प्रदान करते हैं, बल्कि देश-विदेश से आने वाले लाखों पर्यटकों को भी अपनी ओर आकर्षित करते हैं। जाखू मंदिर, श्री नैना देवी, चिंतपूर्णी, ज्वालामुखी, ब्रजेश्वरी देवी, मणिकर्ण साहिब, श्रीखंड महादेव, खीरगंगा, त्रिउंड, रोहतांग दर्रा, स्पीति घाटी, कसोल, मनाली और शिमला जैसे स्थान हिमाचल की पहचान हैं। परंतु विडंबना यह है कि जिस प्राकृतिक सौंदर्य और धार्मिक पवित्रता के कारण ये स्थान प्रसिद्ध हैं, वही आज बढ़ते कचरे और प्लास्टिक प्रदूषण की गंभीर समस्या से जूझ रहे हैं। हर वर्ष हिमाचल प्रदेश में करोड़ों श्रद्धालु और पर्यटक आते हैं। पर्यटन राज्य की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार है, लेकिन इसके साथ उत्पन्न होने वाला ठोस अपशिष्ट (Solid Waste) भी लगातार बढ़ रहा है। पानी की प्लास्टिक बोतलें, चिप्स एवं स्नैक्स के पैकेट, डिस्पोजेबल कप-प्लेटें, धार्मिक सामग्री, पॉलीथीन और अन्य प्लास्टिक कचरा पर्वतीय क्षेत्रों, मंदिर परिसरों, नदियों के किनारों और ट्रैकिंग मार्गों पर आसानी से देखा जा सकता है। कई स्थानों पर कूड़ेदानों की कमी या समय पर कचरा न उठने के कारण यह समस्या और गंभीर हो जाती है। विशेष चिंता का विषय यह है कि यह कचरा केवल सौंदर्य को ही प्रभावित नहीं करता, बल्कि पर्यावरण और जैव विविधता के लिए भी गंभीर खतरा बनता जा रहा है। प्लास्टिक का अधिकांश भाग वर्षों तक नष्ट नहीं होता। यह वर्षा जल के साथ बहकर नदियों और झरनों तक पहुंच जाता है, जिससे जल स्रोत प्रदूषित होते हैं। खुले में पड़ा कचरा बंदरों, गायों तथा अन्य वन्यजीवों द्वारा खा लिया जाता है, जिससे उनके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। कई बार प्लास्टिक और ठोस अपशिष्ट प्राकृतिक जल निकासी मार्गों को अवरुद्ध कर देते हैं, जिससे अचानक बाढ़, जलभराव और भूस्खलन जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है। धार्मिक स्थलों पर श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाए जाने वाले फूल, माला, कपड़े तथा अन्य पूजा सामग्री का वैज्ञानिक तरीके से प्रबंधन न होने के कारण भी बड़ी मात्रा में जैविक एवं अजैविक कचरा उत्पन्न होता है। वहीं, लोकप्रिय ट्रैकिंग स्थलों और कैंपिंग क्षेत्रों में कई पर्यटक अपने पीछे प्लास्टिक बोतलें, खाद्य पैकेट और अन्य अपशिष्ट छोड़ देते हैं। ऊंचाई वाले पर्वतीय क्षेत्रों से इस कचरे को वापस लाना अत्यंत कठिन, महंगा और श्रमसाध्य कार्य है। यह समस्या केवल प्रशासन की नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक और पर्यटक की भी जिम्मेदारी है। यदि हम देवभूमि की पवित्रता और प्राकृतिक विरासत को सुरक्षित रखना चाहते हैं, तो हमें अपने व्यवहार में बदलाव लाना होगा। “जो सामान लेकर जाएं, उसे वापस भी लेकर आएं” जैसी संस्कृति को अपनाना समय की आवश्यकता है। एकल-उपयोग (Single-use) प्लास्टिक का प्रयोग कम करना, पुनः उपयोग योग्य पानी की बोतलों और थैलों का उपयोग करना, कचरे को पृथक-पृथक डालना तथा निर्धारित स्थानों पर ही अपशिष्ट का निस्तारण करना प्रत्येक पर्यटक का नैतिक कर्तव्य होना चाहिए। सरकार और स्थानीय निकायों को भी इस दिशा में और प्रभावी कदम उठाने होंगे। प्रमुख धार्मिक एवं पर्यटन स्थलों पर पर्याप्त संख्या में पृथक्कृत कूड़ेदान स्थापित किए जाएं, कचरा संग्रहण एवं परिवहन व्यवस्था को मजबूत बनाया जाए, जैविक कचरे के लिए कम्पोस्टिंग इकाइयों की स्थापना की जाए तथा प्लास्टिक अपशिष्ट के पुनर्चक्रण (Recycling) को बढ़ावा दिया जाए। साथ ही, पर्यटकों के लिए जागरूकता अभियान, विद्यालयों एवं महाविद्यालयों में पर्यावरण शिक्षा, स्वयंसेवी संगठनों द्वारा नियमित स्वच्छता अभियान तथा नियमों का उल्लंघन करने वालों पर प्रभावी जुर्माना भी आवश्यक है। विश्व के अनेक पर्वतीय देशों ने “Responsible Tourism” (उत्तरदायी पर्यटन) की अवधारणा को सफलतापूर्वक अपनाया है। अब समय आ गया है कि हिमाचल प्रदेश भी पर्यावरण संरक्षण और पर्यटन विकास के बीच संतुलन स्थापित करते हुए एक स्वच्छ और टिकाऊ पर्यटन मॉडल प्रस्तुत करे। देवभूमि हिमाचल केवल पहाड़ों, मंदिरों और नदियों का नाम नहीं है; यह हमारी सांस्कृतिक विरासत, आस्था और प्रकृति के प्रति सम्मान का प्रतीक है। यदि आज हम इसकी स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण के प्रति गंभीर नहीं हुए, तो आने वाली पीढ़ियों को वह हिमाचल नहीं मिल पाएगा जिसकी सुंदरता और पवित्रता की चर्चा आज पूरी दुनिया करती है। स्वच्छ हिमाचल केवल सरकार का अभियान नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक, श्रद्धालु और पर्यटक की साझा जिम्मेदारी है। जब हम प्रकृति का सम्मान करेंगे, तभी प्रकृति भी आने वाली पीढ़ियों के लिए अपनी अनुपम सुंदरता और जीवनदायिनी शक्ति को सुरक्षित रख पाएगी। लेखक: राजन कुमार शर्मा
गांव डुगली, उप तहसील लंबलू,
जिला हमीरपुर, हिमाचल प्रदेश-177029

