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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने ई-चालान में कथित हेराफेरी कर वाहन चालक से 20 हजार रुपये अपने निजी गूगल पे अकाउंट में लेने के मामले में बर्खास्त कांस्टेबल को राहत देने से इनकार कर दिया है. अदालत ने कांस्टेबल की उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमें उसने विभागीय जांच दोबारा कराने के पुलिस उपमहानिरीक्षक मंडी के आदेश को चुनौती दी थी. मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि पिछली जांच का तकनीकी आधार पर रद्द होना आरोपी को दोषमुक्त करने के समान नहीं है. विभाग नियमानुसार प्रक्रिया अपनाकर मामले की नए सिरे से जांच कर सकता है.
मामला बिलासपुर जिले का है, जहां संबंधित कांस्टेबल ट्रैफिक क्लर्क के पद पर तैनात था. आरोपों के अनुसार, 3 मई 2023 को ट्रैफिक पुलिस ने एक वाहन का ‘ड्रिंक एंड ड्राइव’ के तहत चालान किया था. इस तरह का चालान पुलिस स्तर पर कंपाउंड यानी समझौते के जरिए निपटाया नहीं जा सकता. इसके बावजूद कांस्टेबल ने उच्च अधिकारियों की अनुमति के बिना ऑनलाइन ई-चालान ऐप में बदलाव किए. आरोप है कि उसने अदालत में जमा होने वाले जुर्माने की राशि को शून्य और 5,000 रुपये दर्शाया, जबकि वाहन चालक से उसके वकील के माध्यम से 20,000 रुपये अपने व्यक्तिगत गूगल पे अकाउंट में ट्रांसफर करवा लिए.
जांच के दौरान सामने आया कि वाहन चालक से ली गई 20,000 रुपये की रकम सरकारी खजाने में जमा नहीं की गई थी. इसके बाद कांस्टेबल के खिलाफ धोखाधड़ी और जालसाजी के आरोपों में एफआईआर दर्ज की गई. प्रारंभिक जांच के बाद दिसंबर 2023 में पुलिस अधीक्षक बिलासपुर ने उसे सेवा से बर्खास्त कर दिया था.
पुलिसकर्मी के खिलाफ आपराधिक मामला
बर्खास्तगी के खिलाफ कांस्टेबल ने पुलिस उपमहानिरीक्षक मंडी के समक्ष अपील की. डीआईजी ने मामले की समीक्षा के दौरान पाया कि विभागीय कार्रवाई में पंजाब पुलिस रूल्स के नियम 16.38 का तकनीकी रूप से पालन नहीं किया गया था. इस नियम के तहत पुलिसकर्मी के खिलाफ आपराधिक मामला होने पर जिला मजिस्ट्रेट से प्रारंभिक मंजूरी या जांच का निर्देश लेना आवश्यक होता है. इसी प्रक्रिया संबंधी कमी के आधार पर डीआईजी ने पुरानी विभागीय जांच रद्द करते हुए नए सिरे से जांच कराने के आदेश दिए.
कांस्टेबल ने हाईकोर्ट में दलील दी कि एक बार जांच रद्द होने के बाद दोबारा जांच नहीं कराई जानी चाहिए. हालांकि, खंडपीठ ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया. अदालत ने कहा कि तकनीकी आधार पर जांच रद्द होने से आरोपी को क्लीन चिट नहीं मिल जाती. विभाग को नियम 16.38 का पालन करते हुए निष्पक्ष जांच करने का अधिकार है.
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि नियम का उद्देश्य ईमानदार पुलिस अधिकारियों को झूठे मामलों से बचाना है, न कि भ्रष्ट या दोषी अधिकारियों को कार्रवाई से संरक्षण देना. इसी आधार पर अदालत ने नए सिरे से जांच कराने के आदेश को सही ठहराते हुए कांस्टेबल की अपील खारिज कर दी.










