ADVERTISEMENT

पांवटा साहिब : शेरजंग नेशनल पार्क (सिंबलवाड़ा) के चारों ओर ईको सेंसिटिव जोन की अधिसूचना हाईकोर्ट ने की रद्द

पांवटा साहिब : शेरजंग नेशनल पार्क (सिंबलवाड़ा) के चारों ओर ईको सेंसिटिव जोन की अधिसूचना हाईकोर्ट ने की रद्द

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने सिरमौर जिले में स्थित शेरजंग नेशनल पार्क (सिंबलवाड़ा) के चारों ओर ईको सेंसिटिव जोन घोषित करने वाली केंद्र सरकार की 13 जनवरी 2022 की अधिसूचना को असांविधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया है। न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रंजन शर्मा की खंडपीठ ने यह फैसला पंचायत भाटांवाली, पातलियां और बहराल की ओर से दायर याचिका पर दिया है। खंडपीठ ने अपने निर्णय में कहा कि ईको सेंसिटिव जोन घोषित होने से स्थानीय निवासियों के जीवन और अधिकारों पर गहरा प्रभाव पड़ता है। इसलिए, ऐसी घोषणा के लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य है।

अदालत ने कहा कि ईको सेंसिटिव जोन घोषित करने में नियमों की वैधानिक प्रक्रियाओं की अनदेखी की गई है। 2011 के दिशा-निर्देशों के तहत ईको सेंसिटिव जोन घोषित करने से पहले भूमि उपयोग, गतिविधियों और उद्योगों की सूची तैयार करना अनिवार्य था, जिसे इस मामले में नजरअंदाज किया गया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 2015 में जारी किया गया पिछला मसौदा समयसीमा समाप्त होने के कारण रद्द हो गया था। इसके बाद नई अधिसूचना जारी करने से पहले दोबारा कोई नया सर्वे या पंचायतों के साथ परामर्श नहीं किया गया।

कोर्ट ने इस बात पर हैरानी जताई कि शुरुआत में केवल 4 गांवों को शामिल करने का प्रस्ताव था, लेकिन अंतिम अधिसूचना में बिना किसी ठोस आधार या नई प्रक्रिया के 19 गांवों को शामिल कर लिया गया।

केंद्र सरकार ने 13 जनवरी 2022 को एक अंतिम अधिसूचना जारी की थी, जिसके तहत नेशनल पार्क के आसपास के 19 गांवों को ईको सेंसिटिव जोन में शामिल किया गया था। हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद 13 जनवरी 2022 की अधिसूचना अब शून्य हो गई है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि सरकार दोबारा इस क्षेत्र को ईको सेंसिटिव जोन घोषित करना चाहती है, तो उसे कानूनी प्रक्रिया, सर्वे और स्थानीय हितधारकों के साथ परामर्श की प्रक्रिया को नए सिरे से शुरू करना होगा।

याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने इस क्षेत्र को ईको सेंसिटिव जोन घोषित करते समय निर्धारित गाइडलाइंस का पालन नहीं किया।

प्रभावित पंचायतों का कहना था कि बिना किसी नए सर्वे या स्थानीय हितधारकों को विश्वास में लिए 19 गांवों को इस प्रतिबंधित क्षेत्र में डाल दिया गया, जिससे वहां के निवासियों के अधिकारों और गतिविधियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा था। स्कूल में आने के बाद कई बंद पड़े क्रेशर भी शुरू हो जाएंगे क्योंकि वन विभाग द्वारा खनन गतिविधि भी रोक दी गई थी इस निर्णय आने के बाद स्थानीय ग्रामीणों में खुशी की लहर है क्योंकि उनका रोजगार की दिक्कत आ रही थी वहीं स्थानीय उद्योगपतियों ने भी अदालत के इस निर्णय का स्वागत किया है

Related Posts

Next Post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!