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आप्रेशन चिट्टा गैंग “चोरी और पहरेदारी एक साथ नहीं चल सकती

आप्रेशन चिट्टा गैंग “चोरी और पहरेदारी एक साथ नहीं चल सकती

हाल ही में शिमला पुलिस द्वारा 22 वर्षीय एक कथित मादक पदार्थ तस्कर को गिरफ्तार किया जाना निश्चित रूप से गंभीर चिंता का विषय है। इस कार्रवाई की सराहना की जानी चाहिए, किन्तु केवल उसकी प्रशंसा करना पर्याप्त नहीं है। इसके साथ-साथ कई महत्वपूर्ण प्रश्न भी स्वाभाविक रूप से उठते हैं।

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि लगभग 22 वर्ष की आयु का एक युवक क्या वास्तव में छह करोड़ रुपये मूल्य की चिट्टा (हेरोइन) स्वयं खरीद सकता था, अथवा उसके पीछे कोई संगठित अंतरराज्यीय गिरोह कार्य कर रहा है? यह भी अब तक स्पष्ट नहीं किया गया है कि इतनी बड़ी मात्रा में चिट्टा उसे किसने उपलब्ध कराई अथवा उसका वास्तविक स्रोत क्या था। पुलिस ने इस पूरे मामले को केवल कुछ व्हाट्सएप चैट से जोड़कर प्रस्तुत किया है, जबकि इससे कहीं अधिक व्यापक जांच की आवश्यकता प्रतीत होती है। वास्तव मे इसके खरीदार कौन-कौन तस्कर शिमला और कंहा कंहा है शायद कुछ समय बाद पुलिस विभाग बताए।

एक ओर पुलिस लगभग प्रतिदिन प्रेस वार्ताओं के माध्यम से अपनी उपलब्धियों का प्रचार करती है और चिट्टा बरामदगी के आंकड़े प्रस्तुत करती है, वहीं दूसरी ओर राज्य में चिट्टा की आपूर्ति लगातार जारी है। शिमला पुलिस के अधिकांश प्रेस कॉन्फ्रेंस का मुख्य विषय पिछले वर्षों की तुलना में अधिक बरामदगी दर्शाना होता है। इन प्रेस ब्रीफिंग्स की मूल भावना आंकड़ों की प्रतिस्पर्धा प्रतीत होती है, न कि धरातल पर वास्तविक प्रभाव का मूल्यांकन। यदि उपलब्ध आंकड़ों का स्वतंत्र विश्लेषण किया जाए तो ऐसा प्रतीत होता है कि ये बरामदगियां वास्तविक प्रभाव उत्पन्न करने की अपेक्षा जनसंपर्क का अधिक माध्यम बन गई हैं। प्रत्येक जिले में इन अभियानों का स्वतंत्र प्रभाव मूल्यांकन (Impact Assessment) किया जाना चाहिए।

आइए एक घटना पर चर्चा करें। शिमला के एक महाविद्यालय के तीन छात्रों को शिमला पुलिस ने लगभग 15 ग्राम चिट्टा के साथ गिरफ्तार किया। इनमें से एक छात्र ने बताया कि उन्हें शोगी बैरियर पर विशेष टीम ने रोका। उनका कहना था कि पुलिस को पहले से ही यह जानकारी थी कि वे किस वाहन में आ रहे हैं तथा उनके पास कितनी मात्रा में चिट्टा है। पुलिस ने सबसे पहले उसी युवक की तलाशी ली जिसके पास वास्तव में चिट्टा था और बाद में पूरी बरामदगी को अपनी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया। प्रश्न यह उठता है कि शोगी बैरियर पर पुलिस को इतनी सटीक जानकारी पहले से कैसे उपलब्ध थी? वाहन संख्या, यात्रियों की पहचान और उनके पास मौजूद चिट्टा की सटीक मात्रा की पूर्व मे ही अंबा लाल सर को जानकारी थी, आखिर पुलिस को किस स्रोत से प्राप्त हुई? इस प्रकरण पर संदेह लाजमी है । इतना कुछ पुलिस को पहले से ही कैसे पता था ?

ऐसी बरामदगियों को लेकर गंभीर संदेह उत्पन्न होते हैं। कुल्लू में पुलिस प्रशासन की नाक के नीचे आयोजित होने वाली रेव पार्टियां पुलिस की खुफिया व्यवस्था की विफलता का सबसे बड़ा उदाहरण हैं। दूसरी ओर यदि शोगी बैरियर पर पुलिस को इतनी सटीक और लक्षित सूचना पहले से उपलब्ध रहती है, तो यह स्थिति प्रशंसा से अधिक गंभीर प्रश्न खड़े करती है।

गोपनीयता की शर्त पर एक व्यक्ति ने बताया कि शिमला पुलिस वास्तविक अंतरराज्यीय तस्करों को गिरफ्तार नहीं करती। जनवरी 2026 में आईएसबीटी शिमला से लगभग 283 ग्राम चिट्टा के साथ शमशाद मोहम्मद नामक व्यक्ति को गिरफ्तार किया गया था, किन्तु उसके पीछे बताए जा रहे वास्तविक अंतरराज्यीय आपूर्तिकर्ता और कुख्यात तस्कर कुलदीप राणा को बालूगंज पुलिस ने गिरफ्तार नहीं किया। हाल ही में जमानत पर रिहा हुए कुछ युवकों ने अपने अभिभावकों को बताया कि पुलिस वास्तविक सरगनाओं को गिरफ्तार नहीं करती। आगे की गंभीर पत्रकारिता जांच में यह भी सामने आया कि कुलदीप राणा की गिरफ्तारी शिमला पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देश पर नहीं की गई।

अब यह गंभीर संदेह उत्पन्न होता है कि आखिर कुलदीप राणा को शिमला पुलिस ने क्यों गिरफ्तार नहीं किया। कम-से-कम इस मामले में पुलिस मुख्यालय द्वारा एक स्पष्ट प्रेस विज्ञप्ति जारी की जानी चाहिए।

हाल ही में कुल्लू से एक और गंभीर समाचार सामने आया। शिमला पुलिस द्वारा चर्चित एलसीडी बरामदगी मामले में श्रीमती गरिमा त्यागी ने शिमला पुलिस के अधिकारियों के विरुद्ध भ्रष्ट आचरण के गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने आरोप लगाया कि शिमला पुलिस ने रेस्तरां संचालकों से धन की मांग की तथा विशेष टीम के हेड कांस्टेबल अनुपम और जगदीश द्वारा उन्हें दबाव में लिया गया। इस मामले की शिकायत पुलिस अधीक्षक कुल्लू को दी गई और जांच भी कराई गई। जांच में कथित रूप से यह पाया गया कि शिमला पुलिस की विशेष टीम रेस्तरां से मोबाइल फोन, डीवीआर तथा कुछ नकदी अपने साथ ले गई थी। गरिमा त्यागी और उनके पति निशांत त्यागी के साथ मारपीट किए जाने के आरोप भी सामने आए।

कुल्लू के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों ने गोपनीयता की शर्त पर बताया कि उन पर शिमला पुलिस की टीम के विरुद्ध मामला दर्ज न करने का भारी दबाव था। यह भी कहा गया कि पुलिस मुख्यालय की ओर से शिमला पुलिस के विरुद्ध एफआईआर दर्ज करने से रोका गया। पुलिस-तस्करों पर कड़ा रुख करे अच्छा है । पर इतने गंभीर विषय पर अधीक्षक कुल्लू ने लगभग दो माह पूर्व इस संबंध में अपनी रिपोर्ट हिमाचल प्रदेश के पुलिस महानिदेशक को भेजी थी, किन्तु आज तक उन अधिकारियों के विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं की गई जिनके विरुद्ध गंभीर कदाचार के आरोप जांच में सामने आए। यह प्रश्न काफी गंभीर है शायद कुछ समय बाद पुलिस महानिदेशक इस पर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर बताए कि पुलिस के वह अधिकारी कौन थे और अभी तक उन्हे क्यों बचाव मे रखा गया ?

पुलिस की खुफिया व्यवस्था में यह विरोधाभास अत्यंत गंभीर है। एक ओर कुल्लू में रेव पार्टियों की जानकारी पुलिस को नहीं होती, जबकि दूसरी ओर शोगी बैरियर पर पुलिस को यह पूर्व जानकारी रहती है कि कौन व्यक्ति किस वाहन में कितनी मात्रा में चिट्टा लेकर आ रहा है।

यह भी प्रश्न उठता है कि कुलदीप राणा को शिमला पुलिस ने क्यों गिरफ्तार नहीं किया तथा शिमला पुलिस की विशेष टीम के विरुद्ध कोई कार्रवाई क्यों नहीं हुई। हेड कांस्टेबल अनुपम और जगदीश कितने समय से विशेष टीम में तैनात हैं, इसकी भी जानकारी सार्वजनिक की जानी चाहिए। यह भी जानकारी मिली है कि न्यू शिमला थाना प्रभारी (एसएचओ) को केवल इस कारण निलंबित कर दिया गया क्योंकि उन्होंने गरिमा त्यागी के रेस्तरां से बरामद वस्तुओं का जाली जब्ती मेमो बाद की तारीख डालकर तैयार करने से इनकार कर दिया था।

संक्षेप में कहा जाए तो जब पुलिस स्वयं वास्तविक अंतरराज्यीय सरगनाओं के संबंध में संदेहों के घेरे में दिखाई दे तथा कार्रवाई केवल चुनिंदा बरामदगियों तक सीमित रह जाए, तब पूरे अभियान की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है। एक ओर कुल्लू में रेव पार्टी का पता लगाने में पुलिस की खुफिया व्यवस्था विफल दिखाई देती है, जबकि दूसरी ओर शोगी बैरियर पर 1120 ग्राम चिट्टा की बरामदगी जैसी सफलता का दावा किया जाता है। इन विरोधाभासों के संबंध में हिमाचल प्रदेश के पुलिस महानिदेशक को विस्तृत प्रेस विज्ञप्ति जारी कर जनता के समक्ष स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। हिमाचल प्रदेश के पुलिस महानिदेशक को यह स्पष्ट करना चाहिए कि कुल्लू में आयोजित रेव पार्टी की जानकारी हिमाचल प्रदेश पुलिस और जिला प्रशासन को पहले से क्यों नहीं थी। यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि किन परिस्थितियों में राज्य की पुलिस स्वयं ऐसे आयोजनों की रोकथाम करने के बजाय कथित रूप से उनके सुगम संचालन की सहभागी अथवा सुविधादाता बनती हुई दिखाई दी।

माननीय हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के कड़े आदेशों ने यह स्पष्ट रूप से रेखांकित किया है कि नशे के विरुद्ध चलाया जा रहा अभियान लगातार कमजोर आधार पर खड़ा रहा है। वॉकाथॉन जैसे आयोजनों पर करोड़ों रुपये खर्च करने से कोई ठोस और मापनीय परिणाम सामने नहीं आए हैं। प्रेस कॉन्फ्रेंसों के माध्यम से उपलब्धियों का प्रदर्शन मात्र एक सीमित औपचारिक अभ्यास बनकर रह गया है।

हिमाचल प्रदेश की जनता जिला प्रशासन की गैर-जिम्मेदाराना कार्यप्रणाली के विरुद्ध माननीय उच्च न्यायालय द्वारा अपनाए गए सख्त रुख का स्वागत कर रही है। पुलिस अधीक्षक (एसपी) और उपायुक्त (डीसी) का स्थानांतरण जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में एक स्वागतयोग्य कदम है।

वास्तविक प्रश्न यह है कि केवल चुनिंदा छोटी-छोटी बरामदगियों को उपलब्धि बताकर और बड़े स्तर पर होने वाली मादक पदार्थों की तस्करी को निर्बाध रूप से जारी रहने देकर नशा उन्मूलन के अभियान को सफल नहीं बनाया जा सकता। यदि बड़े आपूर्तिकर्ताओं और संगठित तस्करी नेटवर्क पर प्रभावी कार्रवाई नहीं होगी, तो केवल छोटी बरामदगियों के आधार पर नशे के विरुद्ध सफलता का दावा करना वास्तविकता से परे होगा।

हम हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के प्रति आभार व्यक्त करते हैं कि माननीय उच्च न्यायालय ने ऐसे प्रभावी आदेश पारित किए हैं जिनमें जिला मजिस्ट्रेट तथा पुलिस अधीक्षक की जवाबदेही सुनिश्चित की गई है। वास्तव मे यह राज्य सरकार को स्वयं करना चाहिए था । आशा है इन प्रकरणो की भी माननीय उच्च न्यायालय इस पहलू पर भी स्वतः संज्ञान लेगा कि अंतरराज्यीय मादक पदार्थ तस्कर कुलदीप राणा को शिमला पुलिस ने क्यों गिरफ्तार नहीं किया तथा श्रीमती गरिमा त्यागी की शिकायत को किन कारणों से दबा दिया गया।

“चोरी और पहरेदारी एक साथ नहीं चल सकती।”

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