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हिमाचल के लाखों किसान इन दिनों आसमान की ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रहे हैं. खेतों की जुताई लगभग पूरी हो चुकी है, बीज भी तैयार हैं, लेकिन बारिश की कमी ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है. प्रदेश में खरीफ सीजन की शुरुआत हो चुकी है, मगर समय पर बारिश न होने से मक्की, धान, दालों और सब्जियों की बिजाई प्रभावित हो रही है. पहाड़ों में खेती का बड़ा हिस्सा आज भी बारिश पर निर्भर है, इसलिए बादलों की बेरुखी किसानों के लिए सबसे बड़ी परेशानी बन गई है.
प्रदेश के करीब 9 लाख परिवार प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि से जुड़े हैं और लाखों लोगों की आजीविका इस समय मानसून की पहली अच्छी बारिश पर टिकी हुई है. आमतौर पर हिमाचल प्रदेश के कई जिलों में खरीफ फसलों, खासकर मक्की की बिजाई मई के पहले सप्ताह से शुरू हो जाती है. लेकिन इस बार मौसम की बेरुखी के कारण किसानों को इंतजार करना पड़ रहा है. पर्याप्त बारिश नहीं होने से खेतों में नमी की कमी बनी हुई है, जिसके चलते कई क्षेत्रों में बिजाई का काम करीब 10 से 15 दिन तक पिछड़ गया है. किसान खेत तैयार करके बैठे हैं, लेकिन बारिश के बिना बीज डालना जोखिम भरा माना जाता है. कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि यदि आने वाले दिनों में अच्छी बारिश नहीं होती तो बिजाई और अधिक लेट हो सकती है, जिससे फसल की पैदावार पर भी असर पड़ने की आशंका है.
हिमाचल में खरीफ सीजन की सबसे महत्वपूर्ण फसल मक्की मानी जाती है. कृषि विभाग ने इस वर्ष 2.63 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में मक्की की बिजाई का लक्ष्य रखा है, जबकि उत्पादन का लक्ष्य 6.90 लाख मीट्रिक टन निर्धारित किया गया है. अकेले कांगड़ा जिले में 55,550 हेक्टेयर क्षेत्र में मक्की की खेती और 1.47 लाख मीट्रिक टन उत्पादन का लक्ष्य तय किया गया है.
मक्की केवल किसानों की फसल नहीं है, बल्कि प्रदेश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ भी है. फसल तैयार होने के बाद इसका बड़ा हिस्सा पंजाब, हरियाणा और अन्य राज्यों में भेजा जाता है, जहां इसका उपयोग पोल्ट्री उद्योग और पशु चारा बनाने में किया जाता है. कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय पर बारिश नहीं हुई और बिजाई प्रभावित हुई तो उत्पादन में 20 से 30 प्रतिशत तक गिरावट आ सकती है, जिसका सीधा असर किसानों की आय पर पड़ेगा.
इन फसलों पर भी मौसम की मार
खरीफ सीजन में मक्की के अलावा दालों की खेती 18 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में प्रस्तावित है. इसके साथ ही 3,380 हेक्टेयर क्षेत्र में मिलेट्स, 6,600 हेक्टेयर क्षेत्र में आलू और 3,000 हेक्टेयर क्षेत्र में अदरक की खेती का लक्ष्य रखा गया है. अदरक उत्पादन का लक्ष्य 34,500 मीट्रिक टन जबकि आलू उत्पादन का लक्ष्य 85,700 मीट्रिक टन निर्धारित किया गया है. इनके अलावा प्रदेश के कई क्षेत्रों में टमाटर, शिमला मिर्च, फ्रेंचबीन और अन्य सब्जियों की पौध तैयार हो चुकी है. लेकिन पर्याप्त नमी नहीं मिलने से किसानों को रोपाई में दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है.
हिमाचल की सबसे बड़ी चुनौती सीमित सिंचाई व्यवस्था है. प्रदेश में कुल 9,59,223 हेक्टेयर भूमि पर खेती की जाती है, लेकिन केवल 1,14,381 हेक्टेयर क्षेत्र में ही सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है. यानी महज 11.92 प्रतिशत कृषि भूमि सिंचित है, जबकि 88 प्रतिशत से अधिक खेती आज भी बारिश के भरोसे चल रही है. पहाड़ी क्षेत्रों में नहर और सिंचाई परियोजनाओं का विस्तार आसान नहीं है. ऐसे में समय पर मानसून किसानों के लिए जीवनरेखा की तरह होता है. यदि बारिश देर से होती है तो पूरी फसल चक्र प्रभावित हो सकता है.
सामान्य से 82 फीसदी कम बारिश ने बढ़ाई चिंता
मौसम विभाग के आंकड़े किसानों की चिंता और बढ़ा रहे हैं. 12 मई से 19 मई के बीच प्रदेश में केवल 2.5 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई, जो सामान्य से 82 प्रतिशत कम है. सोलन में इस अवधि में एक बूंद बारिश नहीं हुई, जबकि मंडी में 99 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज की गई. कांगड़ा, चंबा, कुल्लू, बिलासपुर, हमीरपुर और सिरमौर सहित अधिकांश जिलों में सामान्य से काफी कम बारिश हुई है. लगातार बढ़ते तापमान और सूखी मिट्टी ने खरीफ सीजन की शुरुआत को प्रभावित कर दिया है.
क्या कहते हैं किसान?
कांगड़ा, मंडी, हमीरपुर और सोलन के कई किसानों का कहना है कि खेतों की जुताई पूरी हो चुकी है, लेकिन बारिश नहीं होने के कारण बीज नहीं डाले जा रहे. किसान कौशल कुमार, रोशन लाल, रमेश कुमार, देवेंद्र कुमार, लक्ष्य कुमार और टेक चंद का कहना है कि मक्की की बिजाई के लिए यह सबसे उपयुक्त समय है, लेकिन पर्याप्त नमी के बिना बीज डालना जोखिम भरा होगा. किसानों के अनुसार यदि अगले कुछ दिनों में अच्छी बारिश नहीं हुई तो बिजाई में देरी होगी और इसका असर सीधे उत्पादन पर पड़ेगा. उन्होंने कहा कि सब्जियों की पौध भी गर्मी से प्रभावित हो रही है और खेतों में नमी बनाए रखना मुश्किल होता जा रहा है.
कृषि विशेषज्ञों की सलाह
कृषि विशेषज्ञ रामकृष्ण चौहान ने कहा, “मौजूदा समय मक्की और अन्य खरीफ फसलों की बिजाई के लिए बेहद महत्वपूर्ण है. यदि समय पर बारिश होती है तो उत्पादन बेहतर रहेगा, लेकिन बारिश में अधिक देरी होने पर किसानों को नुकसान उठाना पड़ सकता है.” उन्होंने किसानों को सलाह दी है कि खेतों में नमी संरक्षण के उपाय अपनाएं, जैविक मल्चिंग का प्रयोग करें और उपलब्ध सिंचाई साधनों का सीमित लेकिन प्रभावी उपयोग करें. अधिक गर्मी के कारण कीटों का खतरा भी बढ़ सकता है, इसलिए किसानों को फसलों की नियमित निगरानी करनी चाहिए.
मौसम विज्ञान केंद्र शिमला के वरिष्ठ वैज्ञानिक संदीप कुमार शर्मा के अनुसार प्रदेश के मैदानी और मध्यम ऊंचाई वाले क्षेत्रों में तापमान सामान्य से 3 से 4 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया जा रहा है. अगले कुछ दिनों में चंबा, कांगड़ा, कुल्लू, लाहौल-स्पीति, शिमला और मंडी के कुछ क्षेत्रों में हल्की बारिश की संभावना है, लेकिन व्यापक और भारी वर्षा के संकेत फिलहाल नहीं हैं. उन्होंने बताया कि आने वाले दिनों में तापमान और बढ़ सकता है तथा कुछ क्षेत्रों के लिए हीट वेव का येलो अलर्ट भी जारी किया गया है.
अब मानसून पर किसानों की निगाहें
प्रदेश में खरीफ सीजन के लिए 3,54,380 हेक्टेयर क्षेत्र में खेती और 8,85,310 मीट्रिक टन खाद्यान्न उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है. लेकिन इन सभी लक्ष्यों की सफलता अब बारिश पर निर्भर है. इन दिनों किसानों के बीच सिर्फ एक ही चर्चा है- आखिर बारिश कब होगी? यदि मौसम की बेरुखी जारी रही तो हिमाचल के लाखों किसानों के लिए यह खरीफ सीजन चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है.










