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DSP विजय कुमार की शिकायत पर SC आयोग सख्त, हिमाचल के DGP और गृह विभाग के ACS को दिल्ली किया तलब

Khabron wala 

हिमाचल प्रदेश पुलिस महकमे में वरिष्ठ स्तर पर सामने आए कथित जातिगत उत्पीड़न और भेदभाव के मामले में राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (NCSC) ने कड़ा रुख अपनाते हुए राज्य पुलिस प्रशासन के शीर्ष नेतृत्व को समन जारी किया है। बता दें कि शिमला के उप पुलिस अधीक्षक (मुख्यालय) विजय कुमार रघुवंसी द्वारा लगाए गए जाति आधारित उत्पीड़न और भेदभावपूर्ण व्यवहार के अति-संवेदनशील आरोपों पर संज्ञान लेते हुए आयोग ने इस मामले में औपचारिक सुनवाई की तिथियां निर्धारित कर दी हैं।

प्राप्त जानकारी के मुताबिक भारतीय संविधान के अनुच्छेद 338 के तहत प्राप्त अपनी संवैधानिक शक्तियों और दायित्वों का प्रयोग करते हुए आयोग ने हिमाचल प्रदेश के पुलिस महानिदेशक और राज्य सरकार के गृह एवं सतर्कता विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव को आयोग के सामने पेश होने का निर्देश जारी किया है। जारी किए गए आधिकारिक नोटिस के अनुसार, दोनों शीर्ष अधिकारियों को 20 अगस्त 2026 को दोपहर 12 बजे नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के मुख्यालय में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना अनिवार्य किया गया है।

14 अगस्त 2026 को आयोग द्वारा आधिकारिक रूप से निर्गत सुनवाई सूचना पत्र के अनुसार, संबंधित अधिकारियों को आयोग के माननीय सदस्य डॉ. पार्थ बिस्वास के समक्ष उपस्थित होना होगा। अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि वे अपने साथ इस मामले से जुड़ी अब तक की अद्यतन कार्रवाई रिपोर्ट (Action Taken Report), संबंधित प्रशासनिक फाइलें और मामले से संबंधित सभी मूल अभिलेख और दस्तावेज अनिवार्य रूप से प्रस्तुत करें।

उल्लेखनीय है कि यह पूरा मामला प्रशासनिक गलियारों में इसलिए भी अत्यधिक चर्चा और चिंता का विषय बना हुआ है, क्योंकि डीएसपी विजय कुमार द्वारा लगाए गए आरोप किसी एक एकाकी प्रशासनिक फैसले या स्थानांतरण तक सीमित नहीं हैं। शिकायतकर्ता अधिकारी का आरोप है कि उनके खिलाफ योजनाबद्ध तरीके से भेदभावपूर्ण और प्रतिशोधात्मक कार्रवाई की एक निरंतर श्रृंखला चलाई गई, जिसका उद्देश्य उन्हें मानसिक और पेशेवर रूप से प्रताड़ित करना था।

डीएसपी विजय कुमार की शिकायत में कई गंभीर बिंदु उठाए गए हैं। इनमें बिना किसी ठोस या पर्याप्त आधार के उनके उपयोग में शामिल सरकारी वाहन को वापस लेना अथवा जबरन छीन लेना शामिल है। इसके अतिरिक्त, रीढ़ की गंभीर चोट और असहनीय शारीरिक पीड़ा की प्रमाणित चिकित्सीय स्थिति के बावजूद, उन्हें दूरस्थ एवं अत्यंत कठिन क्षेत्र में जानबूझकर तैनात किया गया, जिससे उनका स्वास्थ्य और बिगड़े।

इतना ही नहीं, शिकायत में आरोप लगाया गया है कि अधिकारी के विरुद्ध निलंबन और विभागीय जांच शुरू करने के प्रस्तावों को चुनिंदा रूप से बार-बार आगे बढ़ाया गया। शिकायतकर्ता का दावा है कि उनके पक्ष में गवाही देने वाले या उनकी शिकायतों से जुड़े महत्वपूर्ण गवाहों को भी डराया, धमकाया और निशाना बनाया गया। संबंधित गवाहों को संस्थागत रूप से बदनाम करने और प्रताड़ित करने की कोशिशें भी की गईं।

शिकायत में एक और अत्यंत गंभीर आरोप यह है कि कार्यालय के भीतर ऐसा भयग्रस्त वातावरण तैयार किया गया जिससे उन्हें पूरी तरह से अलग-थलग कर दिया जाए। आरोप के अनुसार, जो भी अन्य अधिकारी या कर्मचारी उनसे मिलते थे या बातचीत करते थे, उन्हें भी विभागीय कार्रवाई की सीधी धमकियां दी जाती थीं।

वर्तमान परिस्थिति में आयोग का यह हस्तक्षेप बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पूर्व में जब ये शिकायतें सामने आई थीं, तब राज्य पुलिस नेतृत्व की ओर से इन तमाम कार्रवाइयों को “सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया” और विभागीय नियम-कायदों का हिस्सा करार देकर खारिज करने का प्रयास किया गया था। हालांकि, संवैधानिक आयोग द्वारा इन तर्कों से इतर मामले में औपचारिक सुनवाई तय करना और राज्य के पुलिस प्रमुख को सीधे तलब करना यह दर्शाता है कि मामला अब एक गंभीर संवैधानिक जांच के दायरे में आ चुका है।

अब यह मामला केवल इस साधारण सवाल तक सीमित नहीं रह गया है कि किसी पुलिस अधिकारी का तबादला क्यों हुआ, उनका वाहन क्यों लिया गया या उनके खिलाफ जांच क्यों बैठाई गई। आयोग के समक्ष अब सबसे बड़ा और व्यापक प्रश्न यह है कि क्या प्रशासनिक शक्तियों का मनमाना और चयनात्मक प्रयोग इस तरीके से किया गया जो अनुसूचित जाति से ताल्लुक रखने वाले एक राजपत्रित अधिकारी के खिलाफ जातिगत भेदभाव, उत्पीड़न और प्रतिशोध का रूप ले ले।

इस पृष्ठभूमि में राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के समक्ष पुलिस महानिदेशक की व्यक्तिगत उपस्थिति राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन के लिए एक बड़ा संवैधानिक और प्रशासनिक परीक्षण साबित होगी। 20 अगस्त 2026 को होने वाली इस उच्चस्तरीय सुनवाई पर राज्य भर की नजरें टिकी होंगी, जहां यह तय होगा कि ये कदम वाकई सामान्य प्रशासनिक फैसले थे या फिर संस्थागत उत्पीड़न का हिस्सा।

गौरतलब है कि देश के इतिहास में यह पहला मामला है, जब किसी DGP स्तर के अधिकारी को राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के समक्ष जातिगत उत्पीड़न और भेदभाव के मामले में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना पड़ रहा है। ऐसे में इस मामले की गंभीरता को समझा जा सकता है। हालांकि इस मामले में आगामी परिणाम आयोग द्वारा कोई निर्णय सुनाये जाने के बाद ही सामने आएंगे इस बारे में अभी इतना ही कहा जा सकता है यदि कोई दोषी साबित होता है उसके खिलाफ आयोग सख्त कार्रवाई करेगा

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