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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कर्ज की वसूली से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था देते हुए स्पष्ट किया है कि बैंक से लिए गए ऋण की गारंटी देने वाले व्यक्ति की जिम्मेदारी मुख्य कर्जदार के समान होती है. बैंक या ऋणदाता के लिए यह जरूरी नहीं है कि वह गारंटर के खिलाफ कार्रवाई करने से पहले मुख्य कर्जदार से वसूली के सभी विकल्प समाप्त करे. बैंक अपने विवेक के अनुसार मुख्य कर्जदार या गारंटर, किसी से भी पहले वसूली कर सकता है. न्यायाधीश रोमेश वर्मा ने गारंटरों की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने निचली अदालत के उनकी संपत्ति की नीलामी संबंधी आदेश को चुनौती दी थी.
क्या है पूरा मामला?
मामला कांगड़ा सेंट्रल को-ऑपरेटिव बैंक से जुड़ा है. बैंक ने वर्ष 2012 में मुख्य कर्जदार मेसर्स अखिल स्टील ट्रेडर्स और उसके गारंटरों के खिलाफ 10,99,287 रुपये की वसूली के लिए दीवानी मुकदमा दायर किया था. मुख्य कर्जदार ने वर्ष 2009 में 10 लाख रुपये का ऋण लिया था और याचिकाकर्ताओं ने इसके लिए गारंटी डीड निष्पादित की थी. वरिष्ठ सिविल जज, नादौन, जिला हमीरपुर ने 26 फरवरी 2019 को बैंक के पक्ष में फैसला सुनाते हुए सभी प्रतिवादियों को 12.50 प्रतिशत ब्याज के साथ संयुक्त रूप से उत्तरदायी ठहराया था. इस फैसले को किसी अदालत में चुनौती नहीं दी गई, जिसके चलते यह अंतिम हो गया. इसके बाद बैंक ने रकम की वसूली के लिए निष्पादन याचिका दायर की.
निष्पादन कार्यवाही के दौरान निचली अदालत ने 28 मार्च 2026 को गारंटरों की संपत्ति की बिक्री के लिए वारंट जारी कर दिया. गारंटरों ने हाईकोर्ट में दलील दी कि मुख्य कर्जदार के पास पर्याप्त संपत्ति मौजूद है, इसलिए बैंक को पहले उसी से ऋण की वसूली करनी चाहिए. हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि जब तक गारंटी के अनुबंध में इसके विपरीत कोई शर्त न हो, गारंटर की जिम्मेदारी मुख्य कर्जदार के बराबर होती है. गारंटर बैंक के समक्ष यह शर्त नहीं रख सकता कि उससे भुगतान लेने से पहले बैंक मुख्य कर्जदार के खिलाफ अपने सभी कानूनी उपाय अपनाए. कोर्ट ने इसी आधार पर गारंटरों की याचिका खारिज कर दी.










