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सिरमौर में यहां फिर तैयार ‘सहमति का चुनाव’, लक्की ड्रॉ से तय होगा पूरा पंचायत पैनल

Khabron wala

जहां एक ओर पंचायत चुनाव अक्सर खींचतान, गुटबाजी और खर्चीले मुकाबलों के लिए जाने जाते हैं, वहीं हिमाचल प्रदेश के जिला सिरमौर के शिलाई विधानसभा क्षेत्र की टटियाना पंचायत एक बार फिर अपनी अलग राह पर चलते हुए सुर्खियों में है. यहां चुनाव का मतलब टकराव नहीं, बल्कि सहमति, पारदर्शिता और सामूहिक निर्णय बन गया है. पिछले चुनाव में जिस तरीके से पूरे पंचायत पैनल का निर्विरोध चयन हुआ था, अब उसी मॉडल को इस बार भी अपनाने की तैयारी ने पंचायत को फिर चर्चा में ला दिया है.

लक्की ड्रॉ से तय होगा पूरा पंचायत पैनल
ग्रामीणों के अनुसार, गांव के चार प्रमुख बेड़ों (खानदानों) के बीच पहले से तय व्यवस्था के तहत पंचायत के पद प्रधान, उपप्रधान, बीडीसी और वार्ड मेंबर आपसी सहमति से बांटे जाते हैं. इस व्यवस्था का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि हर बेड़े को बराबर अवसर मिले और किसी भी तरह का असंतोष या विवाद पैदा न हो. जिस बेड़े की जिस पद पर बारी होती है, उसी के भीतर इच्छुक उम्मीदवार अपने नाम की पर्चियां डालते हैं. इसके बाद गांव की समिति की मौजूदगी में ‘लक्की ड्रॉ’ निकाला जाता है और जिस उम्मीदवार का नाम निकलता है, वही निर्विरोध रूप से उस पद पर चुन लिया जाता है.

उम्मीदवारों से जमा करवाई जाती है निर्धारित राशि
इस प्रक्रिया को पूरी तरह व्यवस्थित और जिम्मेदार बनाने के लिए उम्मीदवारों से निर्धारित राशि भी जमा करवाई जाती है. पिछले चुनाव में प्रधान पद के लिए 4 लाख रुपए, उपप्रधान के लिए 2 लाख रुपए, बीडीसी के लिए 1 लाख रुपए और वार्ड मेंबर के लिए 50 हजार रुपए तय किए गए थे. चयनित उम्मीदवार की राशि गांव की समिति द्वारा रख ली जाती है, जबकि अन्य सभी प्रतिभागियों की राशि वापस कर दी जाती है. इससे एक तरह से गंभीर और जिम्मेदार उम्मीदवारों का चयन भी सुनिश्चित होता है.

देवता महासू महाराज के मंदिर फंड में जमा
ग्रामीण माया राम शर्मा ने कहा कि, इससे एकत्रित धनराशि को गांव के आराध्य देवता महासू महाराज के मंदिर फंड में जमा किया जाता है. यह फंड केवल धार्मिक गतिविधियों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि गांव के विकास कार्यों जैसे रास्तों का सुधार, पेयजल व्यवस्था, सामुदायिक भवनों का निर्माण और अन्य आवश्यक सुविधाओं में भी उपयोग किया जाता है. इस तरह यह पूरी प्रक्रिया चुनाव को केवल प्रतिनिधि चुनने तक सीमित नहीं रखती, बल्कि इसे सामूहिक भागीदारी और विकास का जरिया बना देती है.

पहले पंचायत चुनाव के दौरान होती थी गुटबाजी!
वहीं, ग्रामीण सुरेंद्र शर्मा, काका राम शर्मा और लाल सिंह शर्मा अन्य लोग मानते हैं कि इस मॉडल को अपनाने से पहले गांव में पंचायत चुनाव के दौरान अक्सर तनाव, आपसी खींचतान और गुटबाजी देखने को मिलती थी. कई बार चुनावी माहौल सामाजिक रिश्तों में भी कड़वाहट पैदा कर देता था, लेकिन पिछले चुनाव में इस व्यवस्था के लागू होने के बाद न केवल विवाद पूरी तरह खत्म हो गए, बल्कि गांव में भाईचारा, विश्वास और सहयोग की भावना भी पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हुई है.

इस पहल से चुनावी खर्च और समय की बर्बादी पर लगाम!
ग्रामीणों अनिल शर्मा का यह भी कहना है कि इस प्रक्रिया ने चुनावी खर्च और समय की बर्बादी को भी काफी हद तक कम किया है. जहां पहले चुनावों में अनावश्यक खर्च होता था, वहीं अब वही पैसा गांव के सामूहिक हित और विकास कार्यों में लगाया जा रहा है. इससे गांव के लोगों में एक सकारात्मक सोच विकसित हुई है और वे खुद को विकास प्रक्रिया का सक्रिय भागीदार महसूस कर रहे हैं.

देवता महासू महाराज के दरबार में लेते हैं संकल्प
ग्रामीण कमलदीप शर्मा ने बताया कि, इस व्यवस्था को लेकर वे पहले ही देवता महासू महाराज के दरबार में संकल्प ले चुके हैं और इसका पालन पूरे गांव द्वारा सुनिश्चित किया जाता है. इस संकल्प के चलते हर व्यक्ति इस प्रक्रिया का सम्मान करता है और किसी भी तरह के विवाद से बचने की कोशिश करता है. गौरतलब है कि टटियाना पंचायत में पिछली बार बिना किसी चुनावी मुकाबले के पंचायत का गठन हुआ था, जिसने पूरे क्षेत्र में एक अलग उदाहरण पेश किया. अब आगामी पंचायत चुनाव को लेकर भी गांव में उसी सहमति आधारित प्रक्रिया को अपनाने की तैयारियां जोरों पर हैं. यदि इस बार भी यह मॉडल सफल रहता है, तो यह अन्य पंचायतों के लिए भी एक प्रेरणादायक उदाहरण बन सकता है.

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