राजगढ़ और इसके साथ लगते क्योंथल क्षेत्र में बैशाख की सक्रांति अर्थात बीशू का त्यौहार इस वर्ष कोरोना वायरस के भय के चलते काफी फीका रहा । जबकि कालांतर से इस पर्व को हर वर्ष नववर्ष के आगमन के रूप में बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता रहा है और घर पर इस पर्व में मेहमानों का तांता लगा रहता था । बीशू का त्यौहार इस क्षेत्र में करीब तीन दिनों तक चलता है जिसमें बीशू से दो दिन पहले लोग अपने घरों में सिड़कू बनाते है जबकि इस त्यौहार में आटे के बकरे तथा अस्कलियां बनाने की विशेष परंपरा है जिसे घी के साथ खाते हैं । संक्राति अर्थात साजी के दिन लोग अपने घरों के बाहर बुरांस के फूलों की माला लगाते है जिसे इस पर्व में बहुत शुभ माना जाता है परंतु लॉकडाउन के कारण लोग बुरांस के फूलों को लाने में असमर्थ होने कारण इस बार किसी भी घर के बाहर बुरांस के फूल नजर नहीं आए । इसी प्रकार बीशू की साजी के अवसर पर कई स्थानों पर मेलों का भी आयोजन होता था ।
ट्रहाई गांव की इंदिरा ठाकुर पीरन गांव की अमिता ठाकुर ने बताया कि संक्राति के दिन कुलईष्ट की पूजा के अतिरिक्त घर पर खीर व पटांडे को विशेष व्यंजन के रूप से बनाते हैं । पहाड़ों में देवताओं की पूजा के लिए चार प्रमुख त्यौहारों का विशेष महत्व है जिनमें बैशाख संक्राति, श्रावण मास की हरियाली संक्राति, दीपावली और मकर संक्राति शामिल है । कोरोना वायरस के भय के कारण इस बार लोग अपने कुलदेवता के मंदिर में भी दर्शन नहीं कर पाए । इसी प्रकार क्यांेथल क्षेत्र के पीठासीन देवता जुन्गा के मंदिर ठूंड में भी पुजारी के अलावा किसी व्यक्ति द्वारा मंदिर में दर्शन के लिए प्रवेश नहीं किया । देवता के पुजारी नंदलाल का कहना है कि हर वर्ष बैशाख की साजी को पूरे क्षेत्र के लोग नव वर्ष के उपलक्ष्य में मंदिर में आते थे परंतु कोरोना वायरस के संकट के कारण मंदिर के कपाट इस बार पिछले एक माह से बंद की रहे हैं ।












