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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि तबादले के खिलाफ याचिका दायर करने से रोकना न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप या बाधा डालने के समान है. अदालत ने कहा कि ऐसा करना आपराधिक अवमानना की परिभाषा में शामिल है. हाईकोर्ट में याचिका दायर करना देश के संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत न केवल यहां के नागरिकों बल्कि अन्य लोगों का भी संवैधानिक अधिकार है.
हाईकोर्ट की तरफ से की गई कानून की इस स्पष्टता के कारण अनुशासनात्मक कार्यवाही के नाम पर कर्मचारियों को तबादलों के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दायर करने से रोकना अनुशासनात्मक प्राधिकारी को मुश्किल में डाल सकता है. दो दिन पहले प्रदेश सरकार द्वारा लाए गए नए प्रावधान के अनुसार यदि कोई कर्मचारी तबादले के खिलाफ सीधे हाईकोर्ट का रुख करता है तो उसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही अमल में लाई जाएगी.
ऐसे मामलों में संबंधित कर्मचारी के खिलाफ केंद्रीय सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम, 1965 तथा अन्य लागू नियमों के तहत अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की जाएगी. कार्मिक विभाग ने व्यापक मार्गदर्शक सिद्धांत-2013 (सीजीपी-2013) में संशोधन करते हुए स्पष्ट किया है कि यदि कोई कर्मचारी निर्धारित व्यवस्था का उल्लंघन कर सीधे न्यायालय जाता है, तो उसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी. इसके तहत फरवरी 2025 में पैरा 22 ए जोड़ा गया है, जिसमें तबादलों से संबंधित शिकायतों के निवारण की व्यवस्था तय की गई है. कर्मचारियों को निर्देश दिए गए हैं कि वे पहले अपनी शिकायत सक्षम प्राधिकारी के समक्ष रखें.
उल्लेखनीय है कि ऐसे ही एक मामले में दो अधिकारियों को हाईकोर्ट से माफी मांगनी पड़ी है. क्योंकि इन अधिकारियों ने बैंक नीति के विपरीत अपने तबादले को हाईकोर्ट में चुनौती देने वाले कर्मी के खिलाफ कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया था.
मामला हिमाचल प्रदेश ग्रामीण बैंक से जुड़ा हुआ है, जिसमें क्षेत्रीय प्रबंधक ने प्रार्थी को कारण बताओ नोटिस जारी कर पूछा था कि उसने बैंक की नीति को दरकिनार कर अपने स्थानांतरण के खिलाफ सीधे हाईकोर्ट में याचिका दायर क्यों की? क्षेत्रीय प्रबंधक ने प्रार्थी से पूछा था कि बैंक की नीति की जानबूझकर की गई उल्लंघना के लिए उनके खिलाफ क्यों न अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की जाए? उसे कहा गया था कि उपलब्ध विभागीय उपायों का उपयोग किए बिना अदालत का दरवाजा खटखटाने से न केवल संगठन के लिए अनावश्यक मुकदमेबाजी होती है, बल्कि यह प्रबंधन के स्थायी आदेशों की भी अवहेलना भी है.
कोर्ट ने इस कारण बताओ नोटिस का अवलोकन करने के बाद कहा कि प्रथम दृष्टया क्षेत्रीय प्रबंधक का यह कृत्य अदालत की अवमानना के बराबर है. इस पर हाईकोर्ट ने कहा था कि क्षेत्रीय प्रबंधक को याचिकाकर्ता को ऐसा कोई नोटिस जारी करने का कोई अधिकार नहीं है. हाईकोर्ट के सख्त रुख के बाद बैंक के इन उच्च अधिकारियों को अदालत से माफी मांगनी पड़ी. मामला अंतिम निर्णय के लिए कोर्ट में लंबित है. फिलहाल अब अदालत ने कानून को लेकर स्थिति बिल्कुल स्पष्ट कर दी है. ये एक अहम घटनाक्रम है.










