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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने चेक बाउंस मामले में निचली अदालतों से दोषी ठहराए गए एक बस मालिक की पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी. न्यायाधीश राकेश कैंथला ने मामले की सुनवाई करते हुए तीन महीने की जेल और 1.75 लाख रुपये जुर्माने की सजा को बरकरार रखने के आदेश दिए हैं. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि आरोपी चेक पर अपने हस्ताक्षर होने की बात स्वीकार करता है, तो वो केवल यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता कि उसने चेक खाली हस्ताक्षर करके दिया था.
अदालत ने कहा कि ऐसे मामले में नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 118 और 139 के तहत कानूनी देनदारी के लिए चेक जारी किए जाने की धारणा बनती है और इसे गलत साबित करने का दायित्व आरोपी पर होता है. ये मामला शिमला के तारादेवी स्थित टायरों की री-ट्रेडिंग और बिक्री करने वाली फर्म ‘सुपर थ्रेड्स’ से जुड़ा है. फर्म के मालिक ने बस मालिक के खिलाफ नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 के तहत शिकायत दर्ज करवाई थी. शिकायत के अनुसार आरोपी ने अपनी बस के लिए नए टायर खरीदने और री-ट्रेडिंग करवाने के एवज में 1,26,600 रुपये की बकाया राशि का भुगतान करने के लिए यूको बैंक, चक्कर शाखा का चेक जारी किया था, जब चेक को बैंक में भुगतान के लिए प्रस्तुत किया गया तो खाते में पर्याप्त राशि नहीं होने के कारण वह बाउंस हो गया. इसके बाद मामले में कानूनी कार्रवाई शुरू हुई और निचली अदालत ने आरोपी को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई.
आरोपी ने अदालत के समक्ष बचाव में कहा था कि उसने केवल 22 हजार रुपये के टायर खरीदे थे और इसमें से 8 हजार रुपये नकद भुगतान कर दिए थे. उसका दावा था कि उसने शिकायतकर्ता को केवल एक खाली हस्ताक्षरित चेक दिया था, जिसका बाद में गलत इस्तेमाल किया गया. हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए इस दलील को स्वीकार नहीं किया. कोर्ट ने कहा कि चेक पर हस्ताक्षर स्वीकार किए जाने के बाद कानून के तहत यह माना जाता है कि चेक किसी कानूनी देनदारी के निर्वहन के लिए जारी किया गया था. इस धारणा को गलत साबित करने का दायित्व आरोपी पर था, लेकिन याचिकाकर्ता अपने बचाव को साबित करने में नाकाम रहा.
अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि शिकायतकर्ता की ओर से भेजे गए कानूनी नोटिस की रसीद पर आरोपी के हस्ताक्षर मौजूद थे. इससे यह भी सामने आया कि आरोपी को भुगतान करने के लिए पर्याप्त अवसर मिला था. रिकॉर्ड के अनुसार चेक वर्ष 2014 में जारी किया गया था. इस मामले में न्यायिक मजिस्ट्रेट ने अगस्त 2024 में आरोपी को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी. इसके बाद शिमला की सेशन कोर्ट ने जुलाई 2025 में निचली अदालत के फैसले को सही ठहराया था. अब हाईकोर्ट ने पुनरीक्षण याचिका खारिज करते हुए तीन महीने की जेल और 1.75 लाख रुपये के जुर्माने की सजा बरकरार रखी है. कोर्ट ने आदेश दिया कि जुर्माने की राशि शिकायतकर्ता को मुआवजे के तौर पर दी जाएगी.












