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डिजिटल विजन पर शिकंजा या सिर्फ कागजी कार्रवाई? मालिकों की गिरफ्तारी क्यों नहीं, कालाअंब से उठ रहे सवालों पर सरकार और जांच एजेंसियां कब देंगी जवाब?

डिजिटल विजन पर शिकंजा या सिर्फ कागजी कार्रवाई? मालिकों की गिरफ्तारी क्यों नहीं, कालाअंब से उठ रहे सवालों पर सरकार और जांच एजेंसियां कब देंगी जवाब?

हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं मिलने के बावजूद गिरफ्तारी की स्थिति स्पष्ट नहीं, फैक्ट्री के कारोबार की कमान किसके हाथ में है और जांच एजेंसियां अब तक क्या कर रही हैं?

Khabron wala

सिरमौर के औद्योगिक क्षेत्र कालाअंब स्थित डिजिटल विजन दवा फैक्ट्री का मामला अब केवल कथित ड्रग डायवर्जन और दवाओं की आपूर्ति में अनियमितताओं की जांच तक सीमित नहीं रह गया है। अब सबसे बड़ा सवाल जांच एजेंसियों की कार्रवाई, आरोपियों की गिरफ्तारी और सरकारी तंत्र की जवाबदेही पर खड़ा हो रहा है। जब मामला करोड़ों रुपये के कथित अवैध दवा कारोबार से जुड़ा हो, अदालतों में अग्रिम जमानत की राहत न मिली हो और जांच एजेंसी हिरासत में पूछताछ की जरूरत जता चुकी हो, तो फिर यह सवाल उठना लाजिमी है कि गिरफ्तारी की कार्रवाई आखिर किस मोड़ पर अटकी हुई है?

मामले में पुरषोत्तम लाल गोयल और उनके बेटों कोनिक गोयल तथा मैनिक गोयल के नाम सामने आए हैं। एनसीबी की जांच कथित तौर पर मनोप्रभावी दवाओं और कोडीन युक्त कफ सिरप के बड़े पैमाने पर अवैध डायवर्जन से जुड़ी है। विभिन्न मीडिया रिपोर्टों में इस नेटवर्क का अनुमानित मूल्य करीब 600 करोड़ रुपये बताया गया है। आरोपों की अंतिम पुष्टि अदालत में होनी है, लेकिन जांच की गंभीरता को देखते हुए कार्रवाई की पारदर्शिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

जब अदालत से राहत नहीं, तो गिरफ्तारी की स्थिति क्या है?

इस मामले में सबसे अहम घटनाक्रम यह रहा कि पुरषोत्तम लाल गोयल को हाईकोर्ट से अग्रिम जमानत नहीं मिली और बाद में सुप्रीम कोर्ट में भी राहत नहीं मिली। न्यायिक कार्यवाही में हिरासत में पूछताछ की जरूरत का मुद्दा भी सामने आया। ऐसे में आम लोगों का सवाल है कि क्या जांच एजेंसियों ने आरोपियों को गिरफ्तार करने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाए हैं? यदि हां, तो अब तक की कार्रवाई की स्थिति सार्वजनिक क्यों नहीं की जा रही? और यदि गिरफ्तारी नहीं हुई है, तो इसकी वजह क्या है?

यह केवल एक व्यक्ति या कंपनी का सवाल नहीं है। यह कानून के समान और निष्पक्ष इस्तेमाल से जुड़ा सवाल है। किसी आम नागरिक के खिलाफ कार्रवाई में यदि पुलिस तत्काल सक्रियता दिखाती है, तो बड़े कारोबारी मामले में भी उसी तत्परता और पारदर्शिता की अपेक्षा की जाती है। कानून के सामने हर व्यक्ति समान है—फिर कार्रवाई की गति और नतीजों को लेकर इतनी अस्पष्टता क्यों?

फैक्ट्री का कारोबार कौन संभाल रहा है? जांच एजेंसियां स्थिति स्पष्ट करें

स्थानीय स्तर पर यह सवाल भी उठाया जा रहा है कि यदि कंपनी का कारोबार अब भी संचालित हो रहा है, तो उसकी वास्तविक कमान किसके हाथ में है? कोनिक गोयल की भूमिका और कारोबार के संचालन को लेकर उठ रहे सवालों पर संबंधित विभागों को स्पष्ट जानकारी देनी चाहिए। क्या कंपनी का उत्पादन, बिक्री और वितरण पूरी तरह बंद है? क्या किसी अन्य प्रबंधन या प्रतिनिधि के माध्यम से कारोबारी गतिविधियां जारी हैं? क्या औषधि नियंत्रण विभाग ने ताजा निरीक्षण किया है? और क्या एनसीबी को वर्तमान कारोबारी गतिविधियों के बारे में जानकारी है?

इन सवालों का जवाब दस्तावेजों और आधिकारिक रिकॉर्ड के आधार पर सामने आना चाहिए। बिना पुष्टि के किसी व्यक्ति को फरार घोषित करना या यह मान लेना कि वही पूरा कारोबार चला रहा है, उचित नहीं होगा। लेकिन यदि कारोबार जारी है, तो उसकी कानूनी स्थिति और जिम्मेदार व्यक्तियों की भूमिका स्पष्ट करना संबंधित विभागों की जिम्मेदारी है।

सरकार की जवाबदेही कहां है?

इस पूरे प्रकरण में हिमाचल प्रदेश सरकार, पुलिस, औषधि नियंत्रण विभाग और केंद्रीय जांच एजेंसी की भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। चूंकि मामला एनसीबी की जांच से जुड़ा बताया गया है, इसलिए गिरफ्तारी की जिम्मेदारी और कार्रवाई की वास्तविक स्थिति संबंधित जांच एजेंसी से स्पष्ट होनी चाहिए। वहीं, फैक्ट्री के लाइसेंस, उत्पादन, बिक्री और नियामकीय अनुपालन को लेकर राज्य के औषधि नियंत्रण विभाग को भी स्थिति सार्वजनिक करनी चाहिए।

क्या राज्य सरकार ने मामले की प्रगति की समीक्षा की है? क्या संबंधित विभागों से रिपोर्ट मांगी गई है? क्या कंपनी की मौजूदा गतिविधियों की स्वतंत्र जांच हुई है? और यदि आरोपियों की गिरफ्तारी अब तक नहीं हुई है, तो इसके पीछे कानूनी या जांच संबंधी कारण क्या हैं? इन सवालों पर चुप्पी संदेह और अटकलों को ही बढ़ाएगी।

मीडिया ट्रायल नहीं, जवाबदेही की मांग

इस मामले में पत्रकारिता का उद्देश्य किसी को अदालत से पहले दोषी ठहराना नहीं, बल्कि उन सवालों को सामने लाना है जिनका जवाब जनता को मिलना चाहिए। आरोपियों को अपना पक्ष रखने और कानून के तहत बचाव का पूरा अधिकार है। लेकिन इसी के साथ जांच एजेंसियों की जवाबदेही भी उतनी ही जरूरी है। किसी मामले में गंभीर आरोप लगने के बाद केवल प्रेस विज्ञप्तियां और अदालतों में चल रही कार्यवाही पर्याप्त नहीं हैं; जनता यह जानना चाहती है कि जांच कहां पहुंची, क्या कार्रवाई हुई और आगे क्या कदम उठाए जा रहे हैं।

डिजिटल विजन प्रकरण में अब सबसे बड़ा सवाल यही है—यदि जांच एजेंसी को हिरासत में पूछताछ जरूरी लगती है और अदालतों से अग्रिम जमानत की राहत भी नहीं मिलती, तो गिरफ्तारी की मौजूदा स्थिति क्या है? यदि आरोपी उपलब्ध नहीं हैं, तो उन्हें तलाशने के लिए क्या कदम उठाए गए? और यदि फैक्ट्री के कारोबार को लेकर नए सवाल उठ रहे हैं, तो संबंधित विभागों ने उनकी जांच की या नहीं?

इन सवालों का जवाब किसी राजनीतिक बयान या अनुमान से नहीं, बल्कि एनसीबी, पुलिस, औषधि नियंत्रण विभाग और राज्य सरकार के आधिकारिक तथ्यों से आना चाहिए। कानून का इकबाल तभी कायम रहेगा, जब कार्रवाई का आधार व्यक्ति का प्रभाव नहीं, बल्कि कानून और साक्ष्य होंगे।

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