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हिमाचल हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, विवाहित नाबालिग के मां बनने पर पति के खिलाफ नहीं लगेगा पोक्सो एक्ट

Khabron wala

प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि कोई विवाहित नाबालिग लड़की अस्पताल में बच्चे को जन्म देती है, तो केवल इस आधार पर उसके पति के खिलाफ यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम के तहत मामला दर्ज नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि विधायिका का उद्देश्य कभी भी ऐसे मामलों में पोक्सो एक्ट के प्रावधानों को लागू करना नहीं था। न्यायाधीश चिराग भानु सिंह ने जितेंद्र कुमार और अन्य द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर और कानूनी कार्यवाही को रद्द कर दिया।

दिसम्बर 2024 में महिला पुलिस थाना चम्बा में चाइल्ड वैल्फेयर हैल्पलाइन के समन्वयक की सूचना पर एक प्राथमिकी दर्ज की गई थी। सूचना में बताया गया था कि चम्बा के अस्पताल में एक नाबालिग लड़की को डिलीवरी के लिए लाया गया है। इसके बाद पुलिस ने लड़की के पति और उसके ससुराल वालों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता, आईपीसी और पोक्सो एक्ट की विभिन्न गंभीर धाराओं के तहत मामला दर्ज कर लिया था।

याचिकाकर्त्ताओं ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए बताया कि पीड़िता ने अपनी मर्जी और माता-पिता की सहमति से वर्ष 2024 में जितेंद्र कुमार से शादी की थी। तब से वे पति-पत्नी की तरह साथ रह रहे थे और उनका एक बच्चा भी है। अदालत में पीड़िता और उसके पति दोनों ने बयान दिया कि वे अपनी शादीशुदा जिंदगी से खुश हैं और उनके बीच समझौता हो चुका है, इसलिए वे इस मामले को आगे नहीं बढ़ाना चाहते। अदालत ने कहा कि डॉक्टर ने केवल पुलिस को यह जानकारी दी थी कि एक नाबालिग ने बच्चे को जन्म दिया है। लड़की ने डॉक्टर के सामने किसी भी तरह के यौन उत्पीड़न की शिकायत नहीं की थी। ऐसे में पुलिस द्वारा सीधे पोक्सो एक्ट लगाना समझ से परे है। कोर्ट ने साफ किया कि इस तरह के मामले में यदि लड़की नाबालिग है, तो पति के खिलाफ अधिकतम बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 के तहत कार्रवाई हो सकती है, न कि पोक्सो के तहत।

कोर्ट ने इस बात पर चिंता जताई कि ऐसे मामलों में समझौते या परिस्थितियों के बदलने के बाद भी निचली अदालतें संज्ञान नहीं लेतीं, जिससे हाईकोर्ट में याचिकाओं की बाढ़ आ जाती है। कोर्ट ने कहा कि यदि पीड़िता (पत्नी) ट्रायल कोर्ट में आकर स्पष्ट गवाही देती है, तो निचली अदालतों को कानून (धारा 232/255) के तहत आरोपी को वहीं बरी कर देना चाहिए ताकि समय और मानसिक प्रताड़ना से बचा जा सके। हाईकोर्ट ने माना कि यदि इस मुकद्दमे को जारी रखा गया तो यह एक सुखी वैवाहिक जीवन में कड़वाहट पैदा करेगा और न्याय का मजाक होगा। इसी के साथ अदालत ने मामले को बंद करने के आदेश जारी किए।

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