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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य में सरकारी आवासों को आवंटन को लेकर सख्ती दिखाई है. सरकारी आवासों के आवंटन को लेकर नियमों की अनदेखी और अवैध कब्जों पर अदालत ने कड़ा रुख अपनाया है. इस मामले में हाईकोर्ट की तरफ से स्वत संज्ञान के तहत स्वीकार की गई जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने पूर्व सीपीएस यानी मुख्य संसदीय सचिवों को दिए गए विशेष लाभ और सरकारी अधिकारियों की कीमत पर मीडिया कर्मियों को आवंटित किए गए मकानों पर सवाल उठाए हैं. अदालत ने सख्ती दिखाते हुए टिप्पणी की है कि यदि इस मामले में नोटिस जारी न होता तो सरकार इसे कालीन तले दबा देती.
इस मामले में 5 अगस्त को हुई सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष यह बात सामने आई थी कि राज्य सरकार ने हिमाचल प्रदेश सरकारी आवास आवंटन (सामान्य पूल) नियम, 1994 के नियम 24 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए छह पूर्व मुख्य संसदीय सचिवों के रहने को नियमित कर दिया था. खास बात यह है कि इसके लिए संबंधित लोगों की तरफ से कोई भी आवेदन नहीं किया गया था. हाईकोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा था कि यदि अदालत ने इस मामले में नोटिस जारी न किया होता, तो राज्य सरकार इस पूरे मामले को कालीन के नीचे दबा देती.
मामले में अब हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति गुरमीत सिंह संधावालिया की अगुवाई वाली खंडपीठ ने मुख्य सचिव से हलफनामा मांगा था कि पूर्व में ऐसे कितने कर्मचारियों को विशेष अनुमति दी गई है और इन छह पूर्व सीपीएस को बिना आवेदन के यह विशेष लाभ क्यों दिया जा रहा है? कोर्ट ने यह भी पूछा था कि क्या यह शक्तियों का मनमाना इस्तेमाल नहीं है? राज्य सरकार पिछली सुनवाई के आदेश के बावजूद अपना हलफनामा दायर करने में विफल रही. इसी बीच अदालत को सूचित किया गया कि राज्य में अन्य सरकारी अधिकारियों की कीमत पर बड़ी संख्या में सरकारी आवासों पर मीडिया कर्मियों का कब्जा है.
इस पर संज्ञान लेते हुए मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति गुरमीत सिंह संधावालिया व न्यायाधीश न्यायमूर्ति जिया लाल भारद्वाज की खंडपीठ राज्य सरकार को एक और नया हलफनामा दायर करने का निर्देश दिया है. सरकार को अब यह स्पष्ट करना होगा कि मीडिया कर्मियों ने कुल कितने सरकारी आवास घेरे हुए हैं? उन्हें किस कानून या प्रावधान के तहत ये आवास आवंटित किए गए? इन आवंटनों की तारीखें क्या हैं और उन्हें किस श्रेणी (टाइप) के मकान दिए गए हैं? हाई कोर्ट ने सरकार के ढुलमुल रवैये और हलफनामा न सौंपने पर नाराजगी जताते हुए मामले की अगली सुनवाई 28 अक्टूबर 2026 तय की है. तब तक राज्य सरकार को पूर्व सीपीएस और मीडिया कर्मियों, दोनों ही मामलों में विस्तृत ब्यौरा अदालत के समक्ष पेश करना होगा.









